blogid : 5736 postid : 1210

हिंदी की प्रगति पर क्‍यों न गर्व करें

Posted On: 14 Sep, 2011 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Sanjay Dwivediराष्ट्रभाषा के रूप में खुद को साबित करने के लिए आज वस्तुत: हिंदी को किसी सरकारी मुहर की जरूरत नहीं है। उसके सहज और स्वाभाविक प्रसार ने उसे देश की राष्ट्रभाषा बना दिया है। वह अब सिर्फ संपर्क भाषा नहीं है। इन सबसे बढ़कर वह आज बाजार की भाषा है, लेकिन हर 14 सितंबर को हिंदी दिवस के अवसर पर होने वाले आयोजनों की भाषा पर गौर करें तो यों लगेगा जैसे हिंदी रसातल को जा रही है। यह शोक और विलाप का वातावरण दरअसल उन लोगों ने पैदा किया है, जो हिंदी की खाते तो हैं, पर उसकी शक्ति को नहीं पहचानते। इसीलिए राष्ट्रभाषा के उत्थान और विकास के लिए संकल्प लेने का दिन सामूहिक विलाप का पर्व बन गया है। कर्म और जीवन में मीलों की दूरी रखने वाला यह विलापवादी वर्ग हिंदी की दयनीयता के ढोल तो खूब पीटता है, लेकिन अल्प समय में हुई हिंदी की प्रगति के शिखर उसे नहीं दिखते।


अंग्रेजी के वर्चस्ववाद को लेकर हिंदी भक्तों की चिंताएं कभी-कभी अतिरंजित रूप लेती दिखती हैं। वे एक ऐसी भाषा से हिंदी की तुलना कर अपना दुख बढ़ा लेते हैं, जो वस्तुत: विश्व की संपर्क भाषा बन चुकी है और ज्ञान-विज्ञान के विविध अनुशासनों पर उसमें लंबा और गंभीर कार्य हो चुका है। अंग्रेजी से हिंदी की तुलना इसलिए भी नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि हिंदी एक ऐसे क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा है, जो विश्व मानचित्र पर अपने विस्तारवादी, उपनिवेशवादी चरित्र के लिए नहीं, बल्कि सहिष्णुता के लिए जाना जाने वाला क्षेत्र है। फिर भी आज हिंदी, दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आबादी द्वारा बोली जाने वाली भाषा है। क्या आप इस तथ्य पर गर्व नहीं कर सकते? हिंदी की ताकत दरअसल किसी भाषा से प्रतिद्वंद्विता से नहीं, बल्कि उसकी उपयोगिता से ही तय होगी। आज हिंदी सिर्फ वोट मांगने की भाषा है, फिल्मों की भाषा है। बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं, जहां अभी आधारभूत कार्य होना शेष है। उसने खुद को एक लोकभाषा और जनभाषा के रूप में सिद्ध कर दिया है, किंतु ज्ञान-विज्ञान के विविध अनुशासनों पर उसमें काम होना बाकी है। इसके बावजूद हिंदी का अतीत खासा चमकदार रहा है।


नवजागरण और स्वतंत्रता आंदोलन में स्वामी दयानंद से लेकर विवेकानंद तक लोगों को जगाने के अभियान की भाषा हिंदी ही बनी। गांधी ने भाषा की इस शक्ति को पहचाना और करोड़ों लोगों में राष्ट्रभक्ति का ज्वार पैदा किया तो उसका माध्यम हिंदी ही बनी थी। हिंदी के लोकव्यापीकरण की यह यात्रा वैश्विक परिप्रक्ष्य में भी घट रही थी। पूर्वी उत्तर प्रदेश के आजमगढ़, गोरखपुर से लेकर वाराणसी आदि तमाम जिलों से गिरमिटिया मजदूरों के रूप में विदेश के मॉरीशस, त्रिनिदाद, गुयाना, फिजी आदि द्वीपों में गई आबादी आज भी अपनी जड़ों से जुड़ी है और हिंदी बोलती है। यह हिंदी यानी भाषा की ही ताकत थी, जो एक देश में हिंदी बोलने वाले हमारे भारतीय बंधु हैं। इन अर्थो में हिंदी आज तक विश्वभाषा बन चुकी है। दुनिया के तमाम देशों में हिंदी के अध्ययन-आध्यापन का काम हो रहा है। देश में साहित्य-सृजन की दृष्टि से, प्रकाश-उद्योग की दृष्टि से हिंदी एक समर्थ भाषा बनी है। भाषा और ज्ञान के तमाम अनुशासनों पर हिंदी में काम शुरू हुआ है। बहरहाल, हिंदी दिवस को विलाप, चिंताओं का दिन बनाने के बजाए हमें इसे संकल्प का दिन बनाना होगा। एक ऐसा संकल्प, जो सही अर्थो में हिंदी को उसकी जगह दिलाएगा।


लेखक संजय द्विवेदी स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं


| NEXT



Tags:                     

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

2 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

digvijaytrivedi के द्वारा
September 14, 2011

विदेशीयो द्वारा बनायी और देशी सरकारों द्वारा चलाई नीतियों ने भाषा संकर पैदा कर दिए है. जिसने भाषा को भी नपुंशक बना दिया है. में समझता हूँ कि हिंदी को राष्ट्र गौरव व् स्वाभिमान से जोडने की ज़रूरत है जिसके लिए शिक्षा निति में छोटे किन्तु ईमानदार संशोधनो की ज़रूरत है. 

    rajinder prasad के द्वारा
    September 14, 2011

    सृष्टि के आरम्भ से ही मानव-विचारों का आदान-प्रदान अभिव्यक्ति से होता है. अभिव्यक्ति को प्रकट करने का सबसे प्रबल और असरकारी रूप कोई भी ‘भाषा’ नहीं बल्कि मात्र ‘मातृभाषा’ होती है. इतिहास हमें बारम्बार झकझोरता है कि हमारे देश ने गुलामी झेली, उसके जंजीरें एक लम्बे संघर्ष और हमारे पूर्वजों के अनगिनत त्याग और बालिदानों के बाद कटी, लेकिन गंभीरता से सोचने का क्या अब तक उचित समय नहीं आया है कि हम आजादी के छः दशक बीत जाने पर आज भी ‘अंग्रेजी’ गुलामी का जो कलंक ‘ढ़ो’ रहे हैं, क्या उसे ‘ढ़ोने’ की बजाय ‘धोने’ की जरूरत नहीं है? मातृभाषा से अभिव्यक्ति की सम्पूर्णता प्राप्त होती है और सामाजिक व आर्थिक परिवेश के साथ-साथ संस्कार और संस्कृति पर भी उसका दूरगामी प्रभाव पड़ता है. उथल-पुथल मचने वाला तथ्य यह भी है कि वर्तमान में सबसे ज्यादा गिरावट मातृभाषा की हुई है, तभी उसके परिणामस्वरूप हमारे संस्कार गिरे हैं, नैतिकता ह्रास हुई और संस्कृति को चोट पहुंची है. मातृभाषा और अपने देश की माटी से उत्पन्न भाषाओँ के मर्म को समझे बिना ‘जनता की वाणी’ नहीं समझी जा सकती. वैज्ञानिक दृष्टि से भी देखें तो ज्ञात होता है कि मन-मस्तिष्क में विचार की झलक सर्वप्रथम मातृभाषा से ही होती है. सुख-दुःख में आह भी अपनी ही भाषा में निकलती है. इन सब तथ्यों के बावजूद अंग्रेजी का वजूद कम होने की बजाय बढ़ा है. खलबली मचने के लिए ये काफी है कि हमारी पढ़ाई, न्याय, शासन और अर्थार्जन की भाषा ‘अंग्रेजी’ बना दे गयी तो देशभक्ति कमजोर हुई, हमारे शिक्षा प्राप्त करनेवाले नौनिहालों पर अपने भाषा की बजाय अंग्रेजी का प्रभाव बढ़ा. वातावरण का पश्चिमीकरण हुआ, भ्रष्टाचार बढ़ा, ईमानदारी तिरस्कृत हुई, नैतिकता की जड़े खोखली के गयी, लोकतंत्र पर ‘अंग्रेजी मानसिकता’ छाई और तो और अंग्रेजी भारी पड़ने से हमारे देश की भाषाएँ परायी हुई, ऐसे में हमारे पास क्या बच रहा है, यह बताना मुश्किल है. आज के वातावरण में सच्चाई से रूबरू करते ये शब्द ललकारते हैं : हिंदी या हमारी मातृभाषा दौड़ी वहां जहाँ जन-जन था, फिर क्यों अंग्रेजी कर रही उसकी सिंह सवारी. यहीं तो अपनों की आयाती अंग्रेजी का गम था, तभी तो किस्ती वहां डूबी जहाँ पानी कम था. -राजेंद्र प्रसाद, महरौली, नई दिल्ली-30


topic of the week



latest from jagran