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असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की पीड़ा

Posted On: 11 Jan, 2012 में

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संसदीय गतिरोध और नीतियों पर असहमति के कारण देश की कई योजनाएं खटाई में पड़ती दिख रही हैं। संसद के शीतकालीन सत्र में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला। चाहे वह प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मामला रहा हो, खाद्य सुरक्षा बिल या फिर भ्रष्टाचार निरोधी उपाय के रूप में लोकपाल बिल। भारतीय संसद की करीब 60 वर्षो की गरिमामय यात्रा में हमने अधिकांश समय गतिरोध और असहमति में बीतते देखा है। बहुदलीय शासन व्यवस्था के परिणाम मानकर हम अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते है, परंतु यह एक कड़वी सच्चाई है कि कोई भी दल सत्ता में आने के लिए संसदीय गरिमा को ताक पर रखने में झिझक महसूस नहीं करता। बहरहाल, शीतकाली संसद सत्र से लोगों ने काफी उम्मीदें बांध रखी थी, लेकिन इन उम्मीदों के बीच हमने असंगठित क्षेत्रों के लगभग 43 करोड़ श्रमिकों के लिए जरूरी कल्याणकारी योजनाओं पर कभी ध्यान ही नहीं दिया। संप्रग सरकार के चुनावी घोषणापत्र में इनके कल्याणार्थ व्यापक आश्वासन भी दिए गए थे, परंतु ये आश्वासन संभवत: साकार होते नहीं दिख रहे हैं। समानता के साथ विकास में विश्वास रखने वाले भारतीय लोकतंत्र को असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के शोषण व असुरक्षा पर व्यापक ध्यान देने की जरूरत है।


श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार देश में कुल श्रम शक्ति का लगभग 93 प्रतिशत हिस्सा इन असंगठित श्रमिकों का ही है जबकि सकल घरेलु उत्पाद में इनका योगदान 65 प्रतिशत के आसपास है। राष्ट्रीय बचत में भी इनका योगदान अत्यल्प लगभग 45 प्रतिशत है। इसके पीछे कारण यह है कि एक तो ये श्रमिक अपने नियोक्ताओं से कई तरह के शोषण के शिकार हैं दूसरे इनको किसी प्रकार की भविष्यनिधि या सामाजिक सुरक्षा का कवच प्राप्त नहीं है। न्यूनतम मजदूरी दर से भी कम कीमत पर ये अपना श्रम बेचने को मजबूर हैं, क्योंकि इनकी आवाज संगठित श्रमिकों की तरह मजबूत नहीं है। इनके पास विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ भी नहीं पहुंच पाता है और बिचौलिए अथवा अपने नियोक्ताओं द्वारा भी ये काफी उपेक्षित रहते हैं। कार्ल मा‌र्क्स के वर्ग संघर्ष की अवधारणा व साम्यवाद लाने के लिए श्रमिक शक्ति के योगदान की बात भी इन असंगठित श्रमिको पर खरी नहीं उतरती। वर्तमान में श्रमिक संघ जिनकी आवाज सरकार की सत्ता तक हिलाने की औकात रखती थी भी असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के मामले में कुछ नहीं कर पाती। इसके अलावा भी कुछ तथ्य ऐसे हंै जो इन श्रमिक संगठनों की स्थिति में परिवर्तन की ओर संकेत करते हैं।


वर्तमान वैश्विक अर्थव्यवस्था में इन संगठनो के प्रभाव में व्यापक कमी आई है। उद्योग प्रधान देशों में श्रमिकों के रहन-सहन का स्तर ऊंचा उठने, आमदनी में वृद्धि होने के कारण अब श्रमिक संघ या संगठन के प्रति ज्यादा सक्रिय नहीं हो पाते। इंग्लैंड में 1970 के दशक में गोल्डथोर्प, लॉकवुड व अन्य विद्वानों ने वर्गो के ढांचे में संपन्न श्रमिक विषय पर एक अध्ययन किया जिसका उद्देश्य यह पता करना था कि क्या वाकई संपन्न वर्गो व श्रमिक वर्गों की अवधारणा में इस तरीके के बदलाव आए हैं। इस अध्ययन के बाद प्राप्त निष्कर्षो से पता चला कि मजदूर अपने कार्य को जीवन निर्वाह का एक साधन भर समझता है। अत: वह अपने कार्यस्थल से किसी तरह का घनिष्ठ लगाव महसूस नहीं करता और न ही अपने साथियों से मेल-मिलाप बढ़ा पाता है। मा‌र्क्स ने इसी के एक रूप को अलगाव से संबंधित किया है जिसमें श्रमिकों का अपने उत्पादित वस्तु पर कोई अधिकार नहीं होता। इससे उनमें एक तरह के भावनात्मक अलगाव का बोध होता है। उनके श्रम और उत्पादित वस्तु के मूल्य में भारी अंतर होता है और यह अंतर ही उनके शोषण का लाभ मूल्य है जिसका पूंजीपति उपभोग करते हैं। हालांकि श्रमिकों की उत्पादकता बढ़ाने और देश की आय वृद्धि में इन सामाजिक तथ्यों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। वर्तमान श्रमिक चाहे वह संगठित क्षेत्र में हों या असंगठित, पूंजीवाद को मौन स्वीकृति प्रदान कर चुके हैं। कहीं-कहीं छिटपुट आंदोलनों और साथियों के संघर्षो से उन्हें ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता। यही वजह है कि उनके इस निष्कि्रय भाव का बाजार, पूंजीपति और यहां तक कि समाजवादी प्रशासन का दावा करने वाली सरकार भी व्यापक शोषण करती है।


आधुनिक प्रौद्योगिकी की वजह से भी श्रमिक नए-नए मशीनों के साथ काम करते हुए भाव शून्य होते जा रहे हैं। पूंजी प्रधान समाज में उनकी एकमात्र अभिलाषा अधिक से अधिक आय करना भर रह गया है। ओवर टाइम के प्रचलन के बाद से इसमें और भी तीव्रता आई है। पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था के साथ उनका भी पूंजीकरण होता जा रहा है और यह मानवीय गरिमा के विरुद्ध है जिसमे व्यक्ति के श्रम को मशीनी श्रम के बराबर माना जाता है। असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए वैश्वीकृत आर्थिक व्यवस्था में सहभागिता का अभाव है। इस कारण उनकी स्थिति के प्रति किसी का ध्यान ज्यादा आकर्षित नहीं हो पाता। असंगठित श्रमिकों की संख्या तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ बढ़ रही है। इन श्रमिकों में बुनकर, रिक्शा चालक, बीड़ी बनाने वाले, घरेलू नौकर, सब्जी बेचने वाले, फेरी लगाने वाले से लेकर सेवा क्षेत्र के कई नियोजनों में लगे असंगठित श्रमिक तक शामिल हैं। उत्पादन के बदलते तरीकों और सामाजिक व्यवस्था, रहन-सहन में बदलती परिस्थितियों के साथ-साथ असंगठित क्षेत्र तथा श्रमिकों का स्वरूप व अवधारणाएं भी बदली हैं। जटिल आर्थिक, सामाजिक व्यवस्था के बढ़ने से इन कामगारों का दैनिक जीवन अत्यंत व्यस्त व जीवन स्तर अत्यंत निम्न हो गया है।


आय व व्यय की असंगतता ने इनकी आर्थिक स्थिति को इस लायक नहीं छोड़ा कि ये बेहतर जीवन जी सकें। अपनी आजीविका का स्थायित्व बोध न पाकर ये काफी हतोत्साहित भी रहते हैं। इनके अंदर रोजगार तुष्टि का भाव कम ही होता है। एक नई बात और भी सामने आई है जिस पर कुछ मनोचिकित्सकों ने पिछले दिनों एक अध्ययन में स्पष्ट किया कि इनमे मानसिक असंतुलन व व्यवहारगत बीमारियों का खतरा भी संगठित क्षेत्र के श्रमिकों की अपेक्षा ज्यादा होता है। कई समस्याओं को अपने साथ लिए ये श्रमिक आजादी के 64 वर्षो के बाद भी अपनी स्थिति पर लाचार बने हुए हैं और इनके लिए स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है। आर्थिक विकास के सारे परिणाम इनके लिए कोई मायने नहीं रखते। राजनीतिक आश्वासनों व अपने समर्थन में दो शब्द सुनकर ही ये तृप्त हो लेते हैं जबकि वे हमारे समाज के एक अंग और लाभकारी सदस्य हैं। उनकी उपेक्षा किसी भी रूप में उचित नहीं है। हमें उनके रोजगार व सुरक्षा की गारंटी देनी चाहिए। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कई कानूनी प्रावधान किए गए, जिससे इनकी बेहतरी की आशा जगी है परंतु जैसा कि कई योजनाओं के साथ होता आया है ये योजनाएं व कानून भी अपने मूल रूप में लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाई। भारतीय संविधान निर्माताओं ने इनके लिए संविधान में सामाजिक सुरक्षा के लिए व्यवस्था की है जिसका पालन होना चाहिए।


लेखक गौरव कुमार स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं


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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

amit panchal के द्वारा
June 26, 2014

बहुत बढ़िया लेख है गौरव कुमार तथा जागरण की टीम को बधाई असंगठित श्रमिको पर यदि और जानकारी मिल सके


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