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पान सिंह के बहाने एक सार्थक बहस

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तिग्मांशु धूलिया की फिल्म पान सिंह तोमर मौजूदा दौर की एक बेहतरीन फिल्मों में शुमार की जाती है। इस फिल्म में पान सिंह की भूमिका निभा रहे अभिनेता इरफान खान के डायलॉग बीहड़ में बागी होते हैं, डकैत तो पार्लियामेंट में होते हैं को दर्शकों ने खूब सराहा। क्योंकि यह संवाद हमारी भ्रष्ट प्रशासनिक, राजनीतिक और न्यायिक व्यवस्था पर चोट करने के लिए काफी है। अमूमन, दिल्ली का जैसा मिजाज है, इस फिल्म को देखने वालों में युवाओं की संख्या सर्वाधिक रही है। फिल्म शुरू होने से पहले सिनेमा हॉल की गैलरी में अभिनेता इरफान खान की भूमिका पर चर्चा हो रही थी। सभी लोग अपनी-अपनी तरह से इस फिल्म के बारे में चर्चा कर रहे थे। पान सिंह तोमर मध्य प्रदेश के मुरैना जिले का रहने वाला सेना का एक जवान था। राजपूताना राइफल्स में सेवारत रहते हुए उसने एथलेटिक्स में भी रेजीमेंट का नाम ऊंचा किया। पान सिंह तोमर सेना से रिटायर होने के बाद अपने पैतृक गांव मुरैना लौटकर खेती कर बाकी जिंदगी अपने परिवार के साथ गुजारने की इच्छा रखता था, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। जिस जमीन पर वह खेती करना चाहता था, वह जमीन उसके रिश्तेदारों ने गलत तरीके से अपने नाम करा ली। यहीं से शुरू हुई एक रिटायर सेना के जवान के बागी बनने की कहानी।


अस्सी के दशक में पान सिंह तोमर पुलिस मुठभेड़ में मारा गया। उसकी मौत के तीस वर्षो बाद उसकी जिंदगी पर बनी इस फिल्म ने लोगों को चंबल की याद एक बार फिर ताजा करा दी है। वैसे तो चंबल की घाटियों में कई अनकही कहानियां आज भी लोगों के लिए रहस्य बनी हुई हैं। कमजोर प्रशासनिक व्यवस्था एवं भ्रष्ट अधिकारियों के कारण एक धावक किस तरह अपना घर-बार छोड़कर डकैत बनने को विवश होता है और चंबल की घाटियों में अपना गिरोह स्थापित करता है। इस फिल्म के जरिये बखूबी समझा जा सकता है। सत्य घटना पर आधारित और बिना लाग-लपेट के पान सिंह तोमर देश के सिनेमाघरों में सफलतापूर्व चली। एक बागी और डकैत के बीच बहुत बारीक-सी रेखा है, जिसे इस फिल्म के जरिये बखूबी समझा जा सकता है। निर्देशक तिग्मांशु धूलिया ने इस बारीक लकीर को बेहद खूबसूरती से दर्शकों को समझाने की कोशिश की। वैसे तो हिंदी फिल्मकारों के लिए डकैत और बीहड़ शुरू से ही पसंदीदा विषय रहे हैं। सत्तर और अस्सी के दशक में बीहड़ों पर आधारित कई फिल्में बनीं, जिन्हें दर्शकों ने खूब सराहा। उन दिनों जिस देश में गंगा बहती है, मेरा गांव मेरा देश, मुझे जीने दो, बिंदिया और बंदूक, डकैत और शोले जैसी कई फिल्मों में बीहड़ और डकैतों के जुल्म की दास्तां को परदे पर उतारा गया है। पान सिंह तोमर में बंदूकें तो हैं, लेकिन घोड़े नहीं हैं। इस फिल्म के डकैत की आंखों से चिंगारी नहीं निकलती और न ही वह आग उगलते संवादों से खौफ पैदा करता है।


यह फिल्म हमें पान सिंह तोमर की दुनिया में ले जाती है और उन कारणों से वाकिफ कराती है, जिनकी वजह से पान सिंह तोमर एक डाकू बनकर उभरता है। पान सिंह धावक के तौर पर देश के लिए कई पदक जीतता है, लेकिन जब उसे मदद की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तब देश और व्यवस्था पान सिंह का साथ नहीं देती। यह फिल्म एक खिलाड़ी की कुंठा को बड़ी कुशलता से दर्शाती है। असल में देखा जाए तो पान सिंह तोमर की कहानी अकेले मुरैना जिले की कहानी नहीं है। सेना के जवान कठिन हालात में सरहदों की रक्षा करते हुए जब अपने गांव लौटते हैं तो अपनी बाकी जिंदगी अपनी मिट्टी के साथ ही गुजारना चाहते हैं। पान सिंह तोमर भी सेना से रिटायर होने के बाद एक कामयाब किसान बन सकता था, लेकिन भ्रष्ट प्रशासनिक व्यवस्था ने उसे बागी बनने पर मजबूर कर दिया। भूमि विवाद की वजह से ही एक सीधे-सादे आदमी ने बंदूक थाम ली। भूमि विवाद की वजह से देश में हर साल हजारों लोगों की हत्याएं होती हैं। मरने वालों में ज्यादातर नजदीकी रिश्तेदार ही होते हैं। जमीन की खातिर कत्ल का यह सिलसिला हिंदुस्तान में थमने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है।


देश के आजाद हुए साढ़े छह दशक हो गए, लेकिन देश की अदालतों में भूमि विवाद से जुड़े लाखों मामले अब भी लंबित पड़े हैं। दीवानी मामलों का आलम यह है कि एक मुकदमे का फैसला आने तक कई लाशें बिछ जाती हैं और मामला दीवानी के साथ-साथ फौजदारी में तब्दील हो जाता है। इसे हमारे देश की न्यायिक व्यवस्था की कमियां ही कहें कि कोई आदमी अगर न्याय पाने के लिए अदालत में मुकदमा दायर करता है तो ज्यादातर मामलों में फैसला उसके गुजर जाने के बाद होता है। कई मामलों में तो यह भी देखा गया है कि जिसके पास कम जमीन है, अगर उसने न्याय पाने के लिए मुकदमा दायर किया है तो वर्षो की अदालती कार्रवाई में वकीलों को फीस देते-देते उसकी जमीन भी बिक जाती है। असल में कानूनी पेचीदगियों और महंगी न्यायिक प्रक्ति्रया की वजह से आम आदमी के लिए न्याय पाना आकाश कुसुम की तरह हो गया है।


लाखों की संख्या में जिला अदालतों से लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लंबित पड़े मामलों के बारे में अक्सर चिंता जाहिर की जाती है, लेकिन इसके समाधान के बारे में कभी गंभीर पहल नहीं की जाती। सरकार से जुड़े लोग और न्यायविदों का कहना है कि अदालतों में न्यायाधीश की कमी है। अगर जजों की कमी है तो इसे पूरा करने की कोशिश क्यों नहीं की जाती। यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजादी के 64 साल बाद भी देश भर की अदालतों में करोड़ों लोग अपने मुकदमे की पैरवी और न्याय की खातिर पूरा दिन कोर्ट परिसर में व्यतीत कर देते हैं। अगर देखा जाए तो यह देश के मानव संसाधन का सबसे बड़ा दुरुपयोग है। न्यायिक प्रक्रिया सरल और सहज बना दी जाए तो न सिर्फ अदालतों में मुकदमों का बोझ कम होगा, बल्कि मानव श्रम का भी सही दिशा में इस्तेमाल हो पाएगा। आज देश में न्यायिक सुधार की जरूरत है। यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत में जमीन से जुड़े दीवानी मामले पटवारी, तहसीलदारों और भूमि सुधार उपसमाहर्ता (डीसीएलआर) की देन है। पैसों की लालच में जमीन का गलत म्यूटेशन करने से लेकर त्रुटिपूर्ण लगान निर्धारण करने के सैकड़ों मामले रोजाना प्रकाश में आ रहे हैं। यही नहीं, पान सिंह तोमर की तरह जो लोग गांव में अपनी जमीन छोड़कर सेना या दूसरे विभाग में नौकरी करने जाते हैं, वापस लौटने पर उन्हें उनकी जमीन नहीं, बल्कि बेदखली का फरमान मिलता है।


ग्राम पंचायत से लेकर पुलिस और तहसील में कार्यरत राजस्वकर्मी भी जब जमीन कब्जा करने वालों के साथ खड़े नजर आते हैं तो आम लोगों का पुलिस और प्रशासन से यकीन खत्म हो जाता है। फिल्म पान सिंह तोमर के बहाने देश में भूमि विवाद से जुड़ी समस्याओं और उसका समाधान कैसे हो इस बाबत एक नई बहस शुरू कर दी है। यहां सवाल यह पैदा होता है कि आजादी के बाद जब देश में नई आर्थिक नीति, नई औद्योगिक नीति और नई शिक्षा नीति बन सकती है तो भूमि विवाद समाप्त करने के लिए एक ठोस नीति क्यों नहीं बनाई जा रही है।


लेखक अभिषेक रंजन सिंह स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं


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