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यह दाग कभी नहीं धुलेगा

Posted On: 30 Apr, 2012 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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राजीव गांधी के राजनीतिक जीवन को लील जाने वाले बोफोर्स घोटाले के पिटारे से इस बार ऐसा खुलासा हुआ है, जिससे सरकार और कांग्रेस दोनों सकते में हैं। स्वीडन के पूर्व पुलिस प्रमुख और मामले की जांच से जुड़े रहे स्टेन लिंडस्ट्रोम ने 25 वर्ष बाद इस मामले में जुबान खोली है। एक साक्षात्कार में स्टेन का कहना है कि बोफोर्स तोप खरीद सौदे में हुए 64 करोड़ रुपये के घोटाले में तब के प्रधानमंत्री राजीव गांधी के खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं है। राजीव ने इस सौदे में घूस तो नहीं ली थी, लेकिन पर्याप्त साक्ष्यों के बावजूद उन्होंने मुख्य आरोपी और इतालवी व्यापारी अट्टावियो क्वात्रोची को कानूनी फंदे से बचाया। स्टेन ने यह भी खुलासा किया कि फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन का इस मामले से कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन भारतीय जांच अधिकारियों ने जबरन उनका नाम इस घोटाले में घसीटा। स्टेन लिंडस्ट्रोम ने एक बेबसाइट को दिए साक्षात्कार में कहा है कि राजीव गांधी ने बोफोर्स एबी कंपनी से कोई घूस नहीं ली। इस बात के साक्ष्य नहीं हैं कि 1500 करोड़ रुपये के सौदे में राजीव गांधी ने रिश्वत ली, लेकिन उन्होंने क्वात्रोची को बचाने की कोशिशों पर कोई रोक नहीं लगाई और मामले की लीपापोती के प्रयासों को मूकदर्शक बनकर देखते रहे।


बोफोर्स के जिन्न की वापसी


क्वात्रोची के खाते में धन हस्तांतरण के पुख्ता सबूतों के बाद भी उन्होंने इस मामले में कुछ भी नहीं किया। लिंडस्ट्रोम ने आगे कहा कि बोफोर्स तोप सौदे में दलाली के मामले में बहुत से भारतीय संस्थानों का बचाव किया गया। निर्दोष लोगों को सजा दी गई, जबकि दोषियों को जाने दिया गया। क्वात्रोची के खिलाफ पुख्ता सबूत थे। फिर भी स्वीडन या स्विट्जरलैंड में किसी को उनसे पूछताछ की अनुमति नहीं दी गई। गौरतलब है कि 24 मार्च 1986 को भारत सरकार और स्वीडन की हथियार बनाने वाली कंपनी के बीच 400 होवित्जर फिल्डगन की आपूर्ति के लिए 15 अरब अमेरिकी डॉलर का कांट्रेक्ट हुआ था।


फिर बोतल से निकला बोफोर्स का जिन्न


स्वीडिश रेडियो के इस खुलासे के बाद कि बोफोर्स खरीद में घूस के तौर पर एक बड़े भारतीय नेता और सेना के अधिकारियों को बिचौलियों के माध्यम से भारी रकम दी गई है, भारतीय राजनीति में भूचाल ला दिया था। राजीव गांधी की राजनीति बोफोर्स कांड की बलि चढ़ गई। तब से लेकर अब तक बोफोर्स घोटाले की गूंज राजनीति के गलियारों में गूंजती रही है और यह सिलसिला अनवरत जारी है। 20 दिसंबर 2000 को क्वात्रोची को मलेशिया में गिरफ्तार भी किया गया, लेकिन वह जमानत पर छूट गया। भारत सरकार तथा सीबीआइ ने कभी गंभीरता से क्वात्रोची के भारत प्रत्यर्पण और उस पर मामला चलाने का प्रयास नहीं किया। वर्ष 2008 में तो क्वात्रोची के खिलाफ रेड-कॉर्नर नोटिस तक वापस ले लिया गया। सीबीआइ की इस मामले में निष्कि्रयता से एक सवाल यह भी उठा कि क्या क्वात्रोची का बचाव कर सीबीआइ राजीव-सोनिया को क्लीन चिट देना चाहती है? अब जबकि स्टेन लिंडस्ट्रोम ने खुद ही इस सच से पर्दा उठा दिया है कि राजीव गांधी ने ही क्वात्रोची को बचाने के प्रयास किए तो पहली नजर में पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी इस मामले के सहभागी बनते हैं। देश के प्रधानमंत्री से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह किसी भी घोटाले-घपले में मूल दर्शक बन देश की अस्मिता के साथ खिलवाड़ करे। राजीव गांधी की इसी परंपरा को शायद वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी कुशलतापूर्वक निभा रहे हैं।


दोषी न होते हुए भी दोषी का साथ देना नैतिकता के आधार पर दोष साबित करता है और इस वजह से देश राजीव गांधी को बोफोर्स घोटाले का दोषी मानता रहेगा। 64 करोड़ के घोटाले के लिए आम जनता के 250 करोड़ खर्च करने के बाद भी यदि कांग्रेस यह कहती है कि राजीव इस मामले में बेदाग थे तो यह इस देश का न केवल दुर्भाग्य है, बल्कि जनता के साथ एक बेहूदा मजाग भी है। जहां तक बात राजीव गांधी के मित्र रहे फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन की है तो उन पर लगा दलाली का दाग तो धुल गया, लेकिन उनके दिल में जो कसक बाकी है, उसे कौन मिटाएगा? कांग्रेस में गांधी परिवार की राजनीति इतनी ओछी निकली कि दोस्ती को भी दागदार कर दिया गया। अमिताभ ही क्या, इस वाकये से तो अच्छे से अच्छा दोस्त भी शक का शिकार होता रहेगा। कांग्रेस लाख दलीलें दे, लेकिन बोफोर्स घोटाला राजीव गांधी के नाम पर लगा ऐसा दाग है, जिसे कभी नहीं मिटाया जाएगा। कांग्रेस लाख जतन करे, लेकिन बोफोर्स पार्टी नेताओं की नींदें उड़ाता रहेगा।


लेखक सिद्धार्थ शंकर गौतम स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं


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