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प्रधानमंत्री के इस तेवर के निहितार्थ

Posted On: 10 Sep, 2012 Others में

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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संसद सत्रावसान के दिन विपक्ष के विरुद्ध जैसा तीखा हमला किया है, उस पर किसी को हैरत नहीं होनी चाहिए। कोल ब्लॉक आवंटन में भ्रष्टाचार के आरोपों, अपने इस्तीफे की मांग और संसद न चलने के कारण सरकार का मुखिया होने के नाते उनकी निजी झुझलाहट आसानी से महसूस की जा सकती है। किंतु क्या उनकी बातों का तथा इसे अभिव्यक्त किए जाने के लिए अपनाए गए तेवरों का भी समर्थन किया जा सकता है? प्रधानमंत्री ने विपक्ष पर लोकतंत्र को नकारने से लेकर माखौल उड़ाने तक का भी आरोप जड़ दिया। उन्होंने पूर्वोत्तर के दंगे, आर्थिक संकट से लेकर आतंकवाद आदि विषयों का जिक्र करते हुए कहा कि भाजपा की वजह से इन पर संसद में विमर्श करके निर्णय नहीं लिया जा सका, जिससे देश को गंभीर क्षति हुई है। मनमोहन सिंह ने जनता से इसके विरुद्ध खड़ा होने का आह्वान भी कर दिया। यह एक प्रकार से आरपार की लड़ाई का ऐलान है। इसके विपरीत भाजपा अपने रवैये को सही ठहराते हुए कह रही है कि उसके संसद ठप करने से अंतत: देश को फायदा ही होगा, क्योंकि कोल ब्लॉक आवंटन यदि रद हो जाता है और दोषी पकड़े जाते हैं तो खजाने में लाख करोड़ की अतिरिक्त राशि आ जाएगी और आगे से लूट की आशंका भी खत्म। वैसे यह सच है कि 7 सितंबर को सत्रावसान के साथ संसद के मानसून सत्र की कार्यवाही न चलने का रिकॉर्ड बन चुका है। 2010 के शीत सत्र के बाद सबसे कम कार्यवाही वाला सत्र साबित हुआ है।


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8 अगस्त को आरंभ हुए सत्र को निर्धारित अवधि के अनुसार 19 दिन चलना था, लेकिन केवल आरंभ के छह दिन ही कामकाज हुए। लोकसभा का 77 प्रतिशत तथा राज्यसभा का 75 प्रतिशत समय भाजपा एवं राजग के विरोध की भेंट चढ़ गया और कुल मिलाकर 125 घंटे से ज्यादा बेकार चले गए। स्वाभाविक है कि इसके शिकार विधेयक एवं महत्वपूर्ण प्रश्न हुए। कुल 399 तारांकित प्रश्नों में से केवल 11 का ही जवाब आ सका। इसी तरह सरकार ने 29 लंबित विधेयकों पर चर्चा कराकर पारित करने की योजना बनाई थी और 15 नए विधेयक पेश किए जाने थे। चार विधेयक पेश हुए तथा छह किसी तरह पारित हुए। यह भी सच है कि ऐसे कई महत्वपूर्ण विधेयक चर्चा होने या पारित होने से रह गए, जो जरूरी थे। इनमें भूमि अधिग्रहण से संबंधित विधेयक को हम शीर्ष पर ले सकते हैं। इसके आधार पर विचार करें तो ऐसा लगेगा कि वाकई संसद ठप करने वाले दलों ने देश का नुकसान किया है। संसदीय कार्य मंत्री पवन बंसल ने संसद कार्यवाही न चलने से 9 करोड़ रुपये प्रतिदिन का नुकसान होने की बात कही। हालांकि निजी तौर पर गणना करने वाले 10 करोड़ रुपये प्रतिदिन बता रहे हैं। अगर इसे मिला दें तो लोकसभा एवं राज्यसभा दोनों को मिलाकर 210 से 220 करोड़ का नुकसान नजर आएगा। अगर हम देश के समक्ष चुनौतियों को इसके साथ मिला दें तो प्रधानमंत्री का यह आरोप पहली नजर में सही लगेगा कि जो लोग संसद नहीं चलने देते, वे जनता की आवाज दबाते हैं। व्यवधान में समाधान प्रधानमंत्री के अनुसार संसद न चलने देना लोकतंत्र का माखौल उड़ाना तथा विकास को बाधित करना है। उनकी इस पंक्ति को देखिए, सही सोच रखने वाले लोगों को दृढ़तापूर्वक कहना चाहिए कि भाजपा लोकतांत्रिक संस्थाओं का कामकाज चलने दे। इसका अर्थ अत्यंत गंभीर है।


प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जैसे लंबे समय तक सरकारी नौकरी में रहने वाले गैर राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति से इससे ज्यादा कड़ी टिप्पणी की उम्मीद आप नहीं कर सकते। संसदीय लोकतंत्र में देश के लिए नीति बनाने तथा राज्य विधायिकाओं एवं समस्त कार्यपालिका की भूमिका के लिए मार्ग निर्देशक बनने वाली शीर्ष संस्था संसद ही है और यही अगर सुचारू रूप से कार्य नहीं करेगी तो फिर अन्य अंग तो अराजक होंगे ही। इस नाते संसद का लगातार ठप रहना चिंताजनक है। यह भी तर्क दिया जा सकता है कि अगर संसद में बहस ही नहीं होगी तो कोई रास्ता निकलेगा कैसे। नीति बदलने का निर्णय भी तो संसद में बहस और सम्मति के बाद ही हो सकता है। इस प्रकार सारे तर्क संसद न चलने के विरुद्ध तथा किसी तरह संसद चले इसके पक्ष में जाते दिखते हैं। इसलिए जो संसद चलाने के पक्ष में खड़े दिखते हैं, वे सही नजर आते हैं। अब जरा दूसरे नजरिये से इसे देखिए। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने हमारे देश की महत्वपूर्ण खनिज थाती कोयले के आवंटन का अपने नजरिये से आकलन करके वित्तीय क्षति का जो आंकड़ा दिया और उसके साथ उसने सरकार के अंदर कॉरपोरेट-व्यापारियों, दलालों के प्रभाव से नीतियां प्रभावित किए जाने के प्रमाणजनक निष्कर्ष दिए, भविष्य को लेकर उसने जो भयावह चिंता प्रकट की ऐसे में क्या संसद की कार्यवाही संचालित न होने से जो नुकसान बताया जा रहा है, वह उससे कमतर है? दोनों में कोई समानता ही नहीं है। हम मानते हैं कि अगर बिजली या अन्य सामानों के उत्पादन में लगने वाले संसाधन महंगे होंगे तो लोगों को बिजली या अन्य उत्पाद भी महंगे मिलेंगे।


खासकर बिजली वर्तमान आर्थिक ढांचे में मनुष्य के शरीर में खून की धारा की तरह है। इसके उत्पादन में काम आने वाला कोयला यदि महंगा होगा तो बिजली भी महंगी होगी। इस बार हमारे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन को निजी कंपनियों द्वारा हथियाने तथा सरकार की नीतियों से उसे समर्थन मिलने का मामला इससे सामने आ गया है। यह आरोप तो गैर सरकारी स्तर पर पहले से लगता रहा है, जो सच भी है। लेकिन कैग ने इस लूट को ज्यादा साफ कर दिया है। इसमें संसद तथा बाहर बहस होकर नियम बदले और इसके संरक्षण तथा अंतत: जनता को लाभ पहुंचाने वाले मूल्यों के साथ कोयला दिए जाने या आवंटन की नए सिरे से शुरुआत हो, इसमें संसद की भूमिका सर्वोपरि हो सकती है। इसलिए संसद चलनी चाहिए थी और इससे जुड़े सारे पहलुओं पर ईमानदार बहस के बाद सर्वसम्मति से नीतियों पर अंतिम फैसला होना चाहिए था। काश, ऐसा हो पाता! विपक्ष के रुख का भी पूरी तरह समर्थन करना मुश्किल है। लेकिन क्या हमारी राजनीति इस अवस्था में बची है कि किसी भी विवादास्पद या मतभेद वाले मुद्दे पर संतुलन और शांति से विचार करे या इसकी मानसिकता से दुराग्रहरहित होकर साथ बैठे? कांग्रेस क्यों भूल रही है कि जब केंद्र में राजग सरकार थी, उसने सत्ता हाथ में न आने की छटपटाहट के कारण ऐसी बातों पर संसद ठप किया, जिस पर आसानी से बहस हो सकती थी। चाहे कारगिल में आपातस्थिति में धातु के ताबूत खरीदने का मामला हो या तहलका स्टिंग ऑपरेशन अथवा ईराक पर अमेरिका का हमला।


कांग्रेस, वामदलों और भाजपा विरोधी अन्य पार्टियों ने सरकार को कठघरे में खड़ा करने के लिए संसद को ठप करने का कीर्तिमान बनाया और पहली बार 13वीं लोकसभा का 19 प्रतिशत से ज्यादा समय कार्यवाही बाधित होने से नष्ट हो गया। आज यही भाजपा कर रही है तो ये छाती पीट रहे हैं। सरकार का दोष संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी ने विपक्ष के खिलाफ हमलवार रुख अपनाने की सलाह दी और आप यह अजीबोगरीब दृश्य देख रहे हैं कि भ्रष्टाचार का आरोपी होते हुए भी कांग्रेस जगह-जगह विपक्ष के खिलाफ सड़कों पर आक्रामक प्रदर्शन कर रही है। अंतिम दिन प्रधानमंत्री का जनता से विपक्ष के विरुद्ध आवाज उठाने की अपील को देख लीजिए। क्या यह सब संसद चलाने की मानसिकता की भूमिका है? वाजपेयी ने तो कभी ऐसा नहीं किया। विपक्ष पर संसद ठप होने का जितना ठिकरा फोड़ा जाए, सच यह है कि सरकार उससे कहीं ज्यादा दोषी है। सोनिया गांधी ने यदि लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज से बात की भी तो हमलावर होने के अपने बयान तथा प्रधानमंत्री के वक्तव्य के बाद। अगर संसद चलाने की मंशा होती तो प्रधानमंत्री, सोनिया गांधी एवं कांग्रेस तथा संप्रग का रवैया विपक्ष के प्रति ऐसे तीखे जवाबी हमले का नहीं होता। वे यदि शालीन आचरण करते तभी जनमत विपक्ष के खिलाफ जाता। इस समय ऐसा नहीं है। हम कामना करेंगे कि दोनों पक्ष अपने रवैये पर पुनर्विचार करें तथा संसद इसका शिकार नहीं हो। किंतु वर्तमान रवैये में तो ऐसा लगता नहीं कि अगला सत्र भी चल पाएगा। अगर प्रधानमत्रंी एवं कांग्रेसी विपक्ष पर ऐसे हमले करते रहेंगे, उनके आह्वान पर नेता कार्यकर्ता सड़कों पर उतरेंगे तो फिर बीच का रास्ता कहां से निकलेगा।


लेखक अवधेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं


Tag: Prime Minister Manmohan Singh, BJP, monsoon, session of Parliament, Manmohan Singh’s resignation, मनमोहन सिंह.





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