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भीतर की हिंसा का आखेट

Posted On: 8 Oct, 2012 Others,न्यूज़ बर्थ में

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पत्नी को डार्लिग कहना प्रो. देव का तकिया कलाम था। लगाव कम और उपहास अधिक दर्शाता। ऐसा नहीं था कि मिसेज देव इसके प्रति अनजान हों। ऐसे मौके पर उनकी देह में बस एक ऐंठन-सी होती और आंखों में ऐसा निचाट (अकेलापन), जिसमें आपकी चीख कोई नहीं सुनता। तभी उन्होंने दो-टूक शब्दों में कहा था, गंवाने का डर तभी होता है, जब पास में कुछ बचा हो। शब्दों का मंतव्य समझ प्रो. देव पुराने जख्म कुरेदने पर आमादा हो गए, अगर हम जीवन से भरे हुए हों, तो घर कभी भी खाली और अकेला नहीं लगता। हम खुद ही खाली होकर अकेले हो जाते हैं- भीतर से और बाहर से भी। यह तभी होता है, जब हम अपने इस खालीपन व अकेलेपन के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराना शुरू कर देते हैं, आत्म-निरीक्षण से बचने के लिए। पति-पत्नी के बीच अंदर ही अंदर पलता, तयशुदा और बेरहम होते हुए भी दिलचस्प मुकाबला था यह।


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एक-दूसरे को नीचा दिखाने के तमाम हथियारों से लैस। भले ही इसके लिए कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े। दोनों के पास अपने-अपने चाबुक थे। पिटने के लिए और पीटने के लिए भी। यह बात अलग है कि इस चाबुक से कौन पिटता और कौन पीटता है? ऐसा दांपत्य किसे काम्य हो सकता है, लेकिन हम देखते हैं कि अधिकांश भारतीय घरों का आम दृश्य यही है, जिसकी परिणति अक्सर हिंसा में होती है। खासकर तब, जब शब्द भीतर भरे जहर को ढोने में असमर्थ हो जाते हैं, लेकिन कभी-कभी हिंसा शारीरिक न होकर भीतरी होती है, अनोखी भी। इस अनोखी हिंसा का अहसास कवि-कथाकार केशव का ताजा उपन्यास आखेट पढ़ते हुए बार-बार होता है। अपनी श्रेष्ठ कहानियों के अलावा उपन्यास आखेट से भी केशव इंगित करते हैं कि आदमी के रेगिस्तान में औरत किसी नदी की तरह होती है, लेकिन खुदगर्ज आदमी उसे अपने घर-आंगन में निर्मित तरणताल में तब्दील कर डालता है, तन-मन के मैल को धो डालने के लिए। पहले उपन्यास हवाघर के बाद दूसरे आखेट से भी केशव बताते हैं कि आदमी के अबूझ अंतर्मन में मौजूद असुर सदियों से औरत को हवस का शिकार बनाता आया है।


उसी असुर के जरिये वह औरत पर अपना आधिपत्य बनाए रखना चाहता है। शायद इसलिए कि वह उसके शक्तिरूपा हो जाने से डरता है। कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ाने वाला प्रो. देव खुद को सदियों पहले पैदा हुए उस तिब्बती तांत्रिक का वंशज मानता है, जो लामा की मूर्ति के रूप में ठहरी हुई कुटिल मुस्कान के साथ पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता हुआ आज भी प्रो. देव के ड्रॉइंग रूम में विराजमान है। प्रोफेसर अपने ही घर में पली-बढ़ी युवती दीप्ति को तथाकथित तंत्र-विद्या के बल पर कामुकता से सुगबुगाती अंधेरी दुनिया में खींच ले जाता है। वह उसके व्यक्ति को हमेशा के लिए अपराध-बोध की जलती भट्टी में झोंक देता है। दीप्ति को इस घृणित कृत्य का भान तब होता है, जब प्रो. देव के शिष्य-शिष्या आलोक और कामना उसके संपर्क में आते हैं। दीप्ति, अपने से बाहर निकलो। उस रोज जब तुमने कहा तो तुम्हारा कहना मेरे भीतर अरसे से सोये हुए जल में चट्टान की तरह गिरा और हर पल मुझे मथता रहा। कल ही मुझे लगा कि तुम पर भरोसा कर सकती हूं। कहते-कहते दीप्ति का स्वर भारी हो आया, जैसे किसी असहनीय बोझ तले दबी उसकी आत्मा चिथड़ा-चिथड़ा होने को हो। बस, आलोक और कामना ने दीप्ति को प्रो. देव की उस अंधेरी कारा से मुक्त कराने का निर्णय ले लिया।


उपन्यासकार ने प्रो. देव और दीप्ति तथा आलोक और कामना के रूप में दो मानव युगल आमने-सामने खड़े किए हैं- एक प्रतिगामी है तो दूसरा ऊ‌र्ध्वगामी। जीवन के दो रूपों के प्रतीक। जीवन लगातार संकरी होती अंधेरी सुरंग ही नहीं, कहीं दूर टिमटिमाती रोशनियों का टापू भी हो सकता है, उजाले का समंदर भी। यह हमारी दृष्टि पर निर्भर करता है कि हम किसे चुनते हैं। मिस्टर और मिसेज देव से एकदम उलट और अलग हैं आलोक और कामना, जो देव दंपति की नकारात्मक जीवन-दृष्टि के बजाय सकारात्मक दृष्टि से दुनिया को देख रहे हैं : कामना की देहयष्टि छरहरी होते हुए भी भरी-भरी-सी है। कद से न बहुत लंबी, न छोटी। उसका रंग जैसे बर्फीली चोटी पर सुबह की धूप। अर्थपूर्ण मुस्कान लिए बड़ी-बड़ी मेहराबदार आंखें। उंगलियां संवेदनशील, स्निग्ध, कोमल और सुडौल। भरे-भरे होठ लिए उसका चेहरा हमेशा एक विरल आभा से दीप्त रहता। समय के साथ नहीं, बल्कि एक कदम आगे चलने का दृढ़ संकल्प उसकी आंखों से साफ झलकता था। परिपक्वता को अधीरता के साथ जज्ब करता, जिससे वह सोच और जीवन की समझ के स्तर पर अपनी उम्र से कहीं अधिक बड़ी और दृष्टि-संपन्न दिखती और इरादों पर अडिग भी, जैसे एक छलांग में सभी बाधाएं पार कर अपना अभीष्ट पा लेना चाहती हो।


आलोक को एक पल के लिए लगा कि जैसे दुनिया के इस जंगल में अपनी तरह से इस खोज में पूरी ईमानदारी और निष्ठा से जुटी इस युवती के प्रति उसे खुद को पूरी तरह समर्पित कर देना चाहिए। ऐसे में उससे तो क्या, उसकी छाया तक से प्रेम कर सकता है वह। आखेट में जड़-चेतन और आत्मा जैसी उच्च स्तरीय जिंदगी के साथ पशुवत जिंदगी का भी अद्भुत चित्रण हुआ है। यह एक ऐसी कथा है, जिसे भारतीय मिथकों की रोशनी में नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश केशव ने की है, जिसमें वे काफी हद तक सफल हुए हैं। इस बात का ध्यान रखते हुए कि जो प्रासंगिक है, उसे बचाया जाए और जो अप्रासंगिक है, उससे किनारा कर लिया जाए।

लेखक बलराम


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Tag:Women, Social Issue, Novel, World, Hindi,पति-पत्नी, भारतीय, उपन्यास, आखेट, रेगिस्तान, उपन्यासकार



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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

udayraj के द्वारा
September 17, 2013

बहुत खुब ।।

shruti singhania roy के द्वारा
December 6, 2012

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papooda kumar raam के द्वारा
December 6, 2012

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