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आधी आबादी की सुरक्षा का सवाल

Posted On: 12 Oct, 2012 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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हरियाणा में स्त्री जाति के खिलाफ खाप पंचायतों के फरमान कोई नई बात नहीं हैं। नई बात कन्या भ्रूण हत्या के लिए कुख्यात इस प्रदेश में महिलाओं के प्रति अपराध भी नहीं। बस नया सिर्फ इतना है कि पिछले महीने दुष्कर्म के 14 मामले राष्ट्रीय मीडिया की नजर में आ गए और उन पर बहस शुरू हो गई। वह भी उस पैमाने और उस मंच पर नहीं, जिस पर होनी चाहिए। हां सोशल मीडिया में जरूर आक्रोश दिख रहा है। पिछले महीने के ज्यादातर पीडि़त दलित हैं। वरना न जाने कितनी दलित आबरू दबंगों की भेंट चढ़ती आई हैं, जिन पर कभी राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान ही नहीं गया। खुद को महिलाओं की तथाकथित हितैषी और रक्षक के तौर पर पेश करने वाली इन खापों को महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध को रोकने का तरीका उन्हें ही तमाम बंदिशों में रखने में ही दिखाई देता है। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश की खाप ने भी इसी तरह का फरमान जारी कर अपनी पुरुष प्रधान मानसिकता का परिचय दिया था।


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इसी क्रम में रोहतक की खाप ने भी हरियाणा में दुष्कर्म की बढ़ती वारदातों के समाधान के तौर पर लड़कियों की शादी 16 साल की उम्र में ही कराने की सलाह जारी कर दी। यह दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन उससे भी ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण है प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और विपक्ष के नेता ओमप्रकाश चौटाला का खाप के इस पक्ष के समर्थन में उतर जाना और वह भी मुगल काल के उदाहरण के साथ। उन्हें प्रदेश के हालात आज मुगल काल जैसे दिखाई दे रहे हैं। देश में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध विशेषकर दुष्कर्म की वारदातें, निश्चित रूप से चिंता का विषय हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार पिछले पांच वर्र्षो 2006-2011 के दौरान दुष्कर्म के मामले 24 प्रतिशत बढ़े हैं। यदि अब भी इस घिनौने अपराध पर अंकुश लगाने और महिलाओं के लिए पूर्ण सुरक्षित माहौल में जीवन व्यतीत करने की व्यवस्था करने के लिए आवाज बुलंद नहींकी जाती तो इससे ज्यादा भयावह स्थिति और क्या हो सकती है? समाज में बढ़ेंगी कुरीतियां अफसोस कि दुष्कर्म जैसी मानसिक बीमारी पर लगाम लगाने के लिए समाज के जिम्मेदार वर्ग (यदि खाप को भी उसके दावे के मुताबिक एकबारगी जिम्मेदार मान ही लिया जाए) की तरफ से जो सुझाव आ रहे हैं, वे इतने गैरजिम्मेदाराना हैं कि यदि उन पर अमल कर लिया जाए तो समाज में वही कुरीतियां बढ़ जाएंगी जिन्हें रोकने का प्रयास किया जा रहा है।


जाहिर है इस सुझाव या मांग में यह खतरा निहित है कि इसे मान लेने से समाज में, खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में, बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीति के लिए नए दरवाजे खुल जाएंगे। महिला के स्वास्थ्य और उसकी सामाजिक हैसियत के लिए घातक बाल विवाह पर फिलहाल कानून और समाज सेवी संगठनों के प्रयासों के जरिए बाल रोक लगाने की एक कोशिश की जा रही है है। लड़कियों के विवाह की न्यूनतम उम्र घटाने की सलाह देने वाली खाप ने दुष्कर्म के लिए फिल्मों और टीवी पर दिखाई जाने वाली अश्लीलता को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा है कि अगर कम आयु में पुरुषों और महिलाओं को शादी करके अपनी शारीरिक जरूरतों की पूर्ति करने का अवसर मिल जाता है तो इससे महिलाओं के खिलाफ अपराध रोकने में सहयोग मिलेगा। खाप का कहना है कि टीवी और सिनेमाई अश्लीलता के चलते किशोर आसानी से विपरीत सेक्स की ओर आकर्षित हो जाते हैं, उनमें यौन इच्छाएं जल्द जागृत हो जाती हैं और चूंकि वे पर्याप्त परिपक्व नहीं होते इसलिए विपरीत सेक्स के प्रति आकर्षण को रोक नहीं पाते। यह तर्क पढ़-सुनकर ही समझ आ जाता है कि इस तरह के सुझावों में किस तरह की संकीर्ण मानसिकता काम करती है।


गांव के अनुभवी बुजुर्र्गो से बनी खाप को भी मालूम होगा कि कानूनन विवाह की न्यूनतम आयु लड़की के लिए 18 वर्ष और लड़के के लिए 21 वर्ष इसलिए रखी गई है, क्योंकि परिपक्वता इतनी आयु में ही आती है, इसलिए इस आयु को बदलने की बात करने का सवाल ही पैदा नहीं होता। उन्होंने खुद उसी अपरिपक्वता को इस घिनौने अपराध का कारण माना है, फिर वे कैसे दो अपरिपक्व किशोरों को एक बड़े जिम्मेदाराना जीवन में धकेल सकते हैं। खाप महापंचायत के प्रवक्ता सूबे सिंह ने यह सुझाव जारी किया है। इसका समर्थन न सिर्फ मेहम चौबीसी खाप पंचायत और अन्य खापों ने किया है, बल्कि जाट महासभा भी इसके पक्ष में है। इस मुद्दे पर हालांकि अंतिम फैसला महापंचायत की गोहाना (सोनीपत) में जल्द होने जा रही बैठक में लिया जाएगा, लेकिन जिस तरह हरियाणा के विपक्ष के नेता इस मामले में कूदे हैं यह एक मूक राजनीतिक मांग भी बन सकती है। इसकी आशंका इसलिए भी बन जाती है, क्योंकि हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो सगोत्रा और प्रेम विवाह रोकने के लिए बाल विवाह को जरूरी समझते हैं और आज भी अक्षय तृतीया पर हजारों बच्चों का विवाह बिना उम्र देखे कर दिया जाता है। फिर इन लोगों को यह भी लगता है कि बाल विवाह से एक बड़ा खर्च भी बच जाता है।


शादी की उम्र घटाना नहीं समाधान जाट महासभा दुष्कर्म रोकने के लिए पहले ही काफी समय से मांग करती आ रही है कि विवाह की न्यूनतम आयु कम की जाए। उसका मानना है कि पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव में युवाओं की जीवनशैली में बहुत ज्यादा परिवर्तन आया है। उसका तर्क है कि किशोरों का मन और शरीर विवाह की इजाजत दे रहा है तो फिर उनकी कम आयु में शादी करने में क्या बुराई है? यह सुझाव और तर्क देते हुए खाप महापंचायत और जाट महासभा कुछ गंभीर तथ्यों को नजरअंदाज कर रही हैं। पहली बात तो यह कि दुष्कर्म रोकने के लिए विवाह की आयु कम करना कोई समाधन नहीं है। यह कानून व्यवस्था का मामला है और कानून को सख्ती से लागू करके ही इसे रोका जा सकता है, लेकिन अफसोस कि इसके लिए ये तर्कहीन सुझाव गढे़ जा रहे हैं। यही वजह है कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार हिंसक अपराधों में पिछले पांच सालों में 24.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, लेकिन 2011 में हिंसक अपराधों के संदर्भ में सजा देने की दर मात्र 28 प्रतिशत रही, जबकि महिलाओं के खिलाफ हुए अपराधों में तो यह दर 26.9 प्रतिशत ही थी।


इसलिए दुष्कर्म रोकने के लिए पहली जरूरत कानूनों को सख्ती से लागू कर बलात्कारियों को गिरफ्तार करके जल्द से जल्द सजा दिलाने की है। इस मामले में ओडिशा का अनुकरण करना चाहिए, जहां एक बलात्कारी को अपराध करने के 29 दिनों के भीतर ही अदालत ने सजा देकर सलाखों के पीछे भेज दिया। जब तेजी से अपराधियों को कड़ी सजा मिलती है तो उनके मन में कानून का खौफ भी बैठता है, जिससे वे अपनी आपराधिक प्रवृत्तियां दबाए रखते हैं। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि दुष्कर्म जैसी घटनाएं इस वजह से भी होती हैं, क्योंकि पुरुष प्रधान समाज अभी तक महिलाओं के संदर्भ में अपना पक्षपाती नजरिया नहीं बदल पाया है। इसलिए कोख में कन्याओं का कत्ल कर दिया जाता है, जिससे हरियाणा में ही यह स्थिति आ गई है कि प्रति हजार पुरुष केवल 836 महिलाएं ही हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक हरियाणा में इसी कारण 38-45 वर्ष की आयु के ऐसे पुरुषों की संख्या बढ़ती जा रही है, जिन्हें विवाह के लिए लड़कियां नहीं मिल पा रही हैं। महिलाओं के विरुद्ध जो मानसिकता काम कर रही है, उसी की वजह से अक्सर खापें यह फरमान जारी कर देती हैं कि लड़कियां जींस, स्कर्ट आदि न पहनें, मोबाइल फोन का इस्तेमाल न करें। क्योंकि ऐसे परिधानों से वे खुद ही दुष्कर्म जदैसी वारदातों को आमंत्रण देती हैं। और तो और राज्य सरकारें भी कह बैठती हैं कि महिलाएं रात में अकेले न निकलें। आखिर दुनिया की आधी आबादी को अपनी मर्जी से पहनने, घूमने-फिरने का हक क्यों नहीं होना चाहिए? इन तथ्यों की रोशनी में जरूरी मालूम होता है कि दुष्कर्म जैसी घटनाओं को रोकने के लिए न सिर्फ कानून को सख्ती से लागू किया जाए, बल्कि महिलाओं के प्रति नजरिये को भी सकारात्मक बनाने के प्रयास किए जाएं।


साथ ही यह भी आवश्यक है कि विवाह की आयु कम करने की मांग करने वालों की घोर भ‌र्त्सना की जाए और इसके पीछे काम करने वाली मानसिकता को उजागर किया जाए। ताकि भविष्य में कोई राजनेता इस तरह के बयानों के समर्थन में उतरने से पहले सौ बार सोचे। जहां तक खाप पंचायतों का सवाल है तो उन्हें हरियाणा के ही जींद जिले के बीबीपुर गांव से सीख लेनी चाहिए, जिसकी महिलाओं ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ एकजुट होकर आवाज बुलंद की है और देशभर के लिए एक मिसाल कायम की है।


लेखिका नौशाबा परवीन स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं


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