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आदिवासी हितों के लिए अहम कदम

Posted On: 20 Oct, 2012 में

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भारत डोगरा हाल ही में आदिवासी हितों की रक्षा के लिए एक महत्त्‍‌वपूर्ण पहल की गई है। आंध्र प्रदेश के जनजातीय क्षेत्रों में आदिवासियों की भूमि और आजीविका की रक्षा के पंचायती राज और आदिवासी मामलों के मंत्री वी किशोर चंद्र देव ने बॉक्साइट की सात खदानों की लीज रद करने के निर्देश दिए हैं। ये निर्देश उन क्षेत्रों के संदर्भ में दिए गए हैं, जो संविधान के पांचवें अनुच्छेद में उन क्षेत्रों में चिह्नित क्षेत्र हैं, जहां संविधान ने अनुसूचित जन जातियों के हितों की रक्षा के लिए विशेष व्यवस्था की है। जहां ये निर्देश इस विशाखापटनम के आदिवासियों की आजीविका की रक्षा की दृष्टि से महत्त्‍‌वपूर्ण हैं, वहींइनका व्यापक महत्त्‍‌व भी है। संविधान में आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए पांचवे अनुच्छेद में विशेष प्रावधान भावी समस्याओं को ध्यान में रखते हुए किए गए थे, लेकिन उनका उपयोग जमीनी स्तर पर न के बराबर ही हुआ है। ये प्रावधान इतने मजबूत हैं कि यदि आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए राज्यपाल को पांचवें अनुच्छेद के इलाकों में मौजूदा कानून भी रद करने पड़ें या उनका क्रियान्वयन रोकना पड़े तो राज्यपाल को यह अधिकार है।


इस तरह के मजबूत संवैधानिक प्रावधान होने के बावजूद जब कई बार विशेष परिस्थितियों में इनकी जरूरत पड़ी तो इनका उपयोग नहीं किया गया। अब आदिवासी मामलों के मंत्री ने कहा है कि वह पांचवें अनुच्छेद के क्षेत्र के सभी नौ राज्यों की सरकारों को अनुसूचित जनजातियों के भूमि-अधिकारों और आजीविका की रक्षा के कानूनी प्रावधानों पर विशेष ध्यान देने के लिए लिखित में निर्देश जारी करेंगे। इतना ही नहीं, वे सभी नौ राज्यों के राज्यपालों को भी इस आशय का पत्र लिखेंगे कि वे आदिवासियों के बुनियादी हितों की रक्षा की संवैधानिक जिम्मेदारी के प्रति अधिक सचेत और सक्रिय रहें। इस तरह आदिवासी मामलों के मंत्री ने जो पहल की है वह मात्र कुछ खदानों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उसका व्यापक महत्त्‍‌व है। उन्होंने बता दिया है कि संविधान के कुछ अति महत्त्‍‌वपूर्ण, लेकिन उपेक्षित प्रावधानों को कैसे नवजीवन दिया जा सकता है और उनका समुचित उपयोग कर लाखों आदिवासियों की आजीविका और जमीन की रक्षा की जा सकती है। इसके साथ ही आदिवासी हितों का एक अन्य महत्त्‍‌वपूर्ण, लेकिन उपेक्षित पक्ष यह है कि पेसा कानून को भी ठीक से कार्यान्वित नहीं किया गया है। पंचायत राज की अनुसूचित क्षेत्रों में विशेष व्यवस्था के लिए जो कानून 1996 में बनाया गया था उसी को संक्षेप में पेसा कानून कहा जाता है। यों तो किसी भी राज्य में पेसा कानून का संतोषजनक क्रियान्वयन नहीं हुआ, पर झारखंड में तो पेसा ही नहींइससे पहले के आदिवासी स्वशासन के अन्य कानूनों का बड़े पैमाने पर उल्लंघन होता रहा है।


यह तथ्य इस वर्ष जन संवादों के दौरान झारखंड में आयोजित संगोष्ठियों, जन-सुनवाइयों और जन-सभाओं में बार-बार उभर कर सामने आया। इस अवेहलना का एक दुखद कारण यह है कि सरकार बड़े पैमाने पर आदिवासी किसानों और ग्रामीण समुदाय की भूमि बड़े उद्योगों एवं खनन कंपनियों को सौंपने की तैयारी कर रही है। जमशेदपुर में आयोजित सार्वजनिक जन-सभा में ग्राम स्वराज्य संगठन के वरिष्ठ कार्यकर्ता किशोर चंद मार्डी ने बताया कि झारखंड के 15 जिले पेसा के दायरे में हैं। छोटानागपुर टेनेन्सी अधिनियम 11 जिलों में लागू है और संथाल परगना टेनेन्सी अधिनियम 6 जिलों में लागू है। इन सभी कानूनों का उद्देश्य आदिवासी समुदायों का स्वशासन स्थापित करते हुए उन्हें जल, जंगल और जमीन पर नियंत्रण देना है। आज इन कानूनों के संदर्भ में संविधान और नियम-कानून के सम्मान के लिए भी आंदोलन चलाना पड़ रहा है। कोलहान और संथाल परगना क्षेत्र में ग्राम सभाओं के बार-बार दर्ज किए गए विरोध को नजरअंदाज कर बड़े उद्योगों और खनन परियोजनाओं को स्वीकृति दी जा रही है। इस संगठन के हरी सिंह भूमिका ने कहा कि पूर्वी सिंहभूम के जादूगोड़ा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर यूरेनियम का खनन हो रहा है, जिसके लिए ग्राम सभाओं से अनुमति नहीं ली गई। समुचित पुनर्वास योजना के बिना ही अनेक गांव विस्थापित कर दिए गए। हरी सिंह के मुताबिक 2005 से अभी तक अनेक कंपनियों से राज्य सरकार ने 105 एमओयू साइन किए हैं और इनके अंतर्गत एक लाख एकड़ से अधिक भूमि का अधिग्रहण किया जाना है।


चायबासा (पूर्व सिंहभूम) में आयोजित जन सभा में कानून विशेषज्ञ चन्द्रभूषण ने कहा कि छोटा नागपुर टेनेन्सी अधिनियम और संथाल परगना टेनेन्सी अधिनियम का उद्देश्य स्थानीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा करना था, लेकिन इन कानूनों की उपस्थिति के बावजूद झारखंड राज्य में 2,00,000 एकड़ भूमि छिन गई और अब सरकार इन कानूनों को ही बदल देने की तैयारी कर रही है। लातेहार जिले के खेड़ गांव की जनसुनवाई में सामाजिक कार्यकर्ता जितेंद्र प्रसाद ने बताया कि औरंगा बांध, नेतराहाट फायरिंग रेंज परियोजना, बेतला राष्ट्रीय पार्क परियोजना, कुटकू बांध और भेडिया अभ्यारण के कारण बड़े पैमाने पर विस्थापन की आशंका है, लेकिन जन-विरोध के कारण कुछ परियोजनाओं को फिलहाल अस्थायी रूप से रोका गया है। यह अनुचित है कि ऐसे अनुसूचित क्षेत्र और आदिवासी स्वशासन के क्षेत्र में ग्राम सभाओं की स्वीकृति के बिना इस तरह बड़े स्तर का विस्थापन करने वाली परियोजनाओं को मंजूरी मिल गई। मधुपुर क्षेत्र के बुड़ई गांव में आयोजित संगोष्ठी में वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता अरविंद ने कहा कि छोटा नागपुर टेनेंसी एक्ट में संशोधन के प्रस्ताव का उद्देश्य स्वतंत्र व औद्योगिक कंपनियों को बेहिसाब जमीन का हस्तांतरण करना है। आदिवासी स्वशासन को लेकर हुए सशक्त आंदोलनों के बाद भी आदिवासी मंत्रणा परिषद के सुझाव न मानना अनुचित है।


झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में विभिन्न आंदोलनों के लगभग 1000 से ज्यादा समर्थक राज्य के दमन का शिकार बन चुके हैं। यह सिर्फ चंद जिलों की चंद ग्राम सभाओं का मसला नहीं है। पाकुड़ जिले में कोयला खनन के लिए 32 गांवों को चिह्नित किया गया है और परंपरागत पंचायतों के प्रस्तावों की अवहेलना करते हुए भूमि अधिग्रहण किया गया। किसी भी खनन परियोजना से पहले जनसुनवाई नहीं की गई और स्थानीय आदिवासियों की ओर से विरोध करने पर उन्हें आपराधिक मामलों में फंसा दिया गया। खनन और उद्योगों के बढ़ते प्रदूषण के बीच लोगों का स्वास्थ्य तबाह हो रहा है। इस संदर्भ में यह महत्त्‍‌वपूर्ण है कि आदिवासी मामलों के मंत्री ने पेसा कानून ठीक से लागू करने व जन सुनवाइयां आयोजित करने पर भी जोर दिया है। इस पहल को जन-सत्याग्रह की मांगों की स्वीकृति से जोड़ दिया जाए तो आदिवासी हितों की रक्षा के लिए यह अहम कदम हो सकता है।


लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं


Tag :,झारखंड, छत्तीसगढ़ , ओडिशा , परंपरागत पंचायतों, सामाजिक कार्यकर्ता , आदिवासियों , आंध्र प्रदेश के जनजातीय , छोटा नागपुर , चायबासा , आदिवासी स्वशासन



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