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विकल्प का संकट

Posted On: 20 Oct, 2012 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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raj nathप्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की इस बात से असहमत नहीं हुआ जा सकता कि नकारात्मक राजनीति से विश्व में भारत की छवि खराब हो रही है। लेकिन क्या उन्होंने कभी यह विचार किया है कि इसकी शुरुआत किसने की। क्या किसी भी मसले पर उन्होंने राजनीतिक दलों को विश्वास में लिया है। यदि वह मानते हैं कि सभी राजनीतिक दलों द्वारा उनकी हां में हां मिलाना ही सकारात्मक राजनीति है, तो यह उनकी भूल है। भारत में इस पैमाने पर भ्रष्टाचार कभी नहीं हुआ जितना संप्रग-2 के कार्यकाल में। स्वयं प्रधानमंत्री पर प्रत्यक्ष आरोप तो लगा ही है, जिस परिवार के निर्देश पर वह फैसले लेते हैं वह भी अब गंभीर आरोपों से घिर गया है। जैसे सत्तापक्ष भ्रष्टाचारियों को बचाने के लिए न्यायालय में जाने का तर्क दे रहा है, वैसे ही विपक्षी दल विरोध की मात्र औपचारिकता निभा रहे हैं। इस समय जरूरत है महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन की, डॉ. राममनोहर लोहिया के सिविल नाफरमानी की या फिर जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति की।


महात्मा गांधी तो सिर्फ दो अक्टूबर और तीस जनवरी को समाधि पर फूल-माला चढ़ा देने भर के लिए रह गए हैं। देश के अवाम का मूड टिहरी और जंगीपुर उपचुनावों के परिणाम भर से नहीं समझा जा सकता है। जनता के मूड की पहली झलक तब मिली थी जब अन्ना हजारे ने रामलीला मैदान में अनशन किया था। देशभर में बिना किसी संगठन के जनता के उठ खड़े होने की वह घटना जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति की स्मृति ताजा कर देती है। अन्ना हजारे का अभियान विभाजित होकर राजनीतिक बनने से पहले ही अपनी छाप खो चुका था। टीम को अपने अलावा कोई अन्य ईमानदार व्यक्ति या दल दिखाई ही नहीं पड़ता था। फलत: अन्ना तो उससे अलग हो ही गए। भरपूर प्रचार के बावजूद टीम केजरीवाल भी अंतत: विफल होकर बैठ जाएगी। सत्ता की निरंकुशता और विपक्ष की निष्कि्रयता के कारण अन्ना हजारे को जो जनसमर्थन मिला था, वह भी अल्पकालिक साबित हो रहा है।


गांधी, लोहिया या जयप्रकाश के अभियानों की सफलता का कारण जहां जनआकांक्षाओं के अनुरूप था वहीं राजनीतिक लाभ-हानि की सोच से परे भी था। आज स्थिति यह है कि अनेक क्षेत्रीय दल सीबीआइ के भय से कांग्रेसोन्मुखी हैं और भाजपा विरोध की महज औपचारिकता निभाने में लगी है। वह इस आकलन पर निश्चिंत है कि यदि अगले लोकसभा चुनाव में उसे 160-170 सीटें मिल जाती हैं तो अनेक दल उसके खेमे में खुद ब खुद आ जाएंगे। यदि भाजपा भी सत्ता मोह से ग्रसित है तो फिर उन दलों को दोष देने से कोई लाभ नहीं जिनके नेताओं को सीबीआइ का डर दिखाकर कांग्रेस उनका भयदोहन कर रही है। सलमान खुर्शीद के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या कोई मंत्री अपनी अध्यक्षता वाली संस्था के लिए सरकारी अनुदान ले सकता है? सांसद निधि के उपयोग में यह प्रावधान है कि कोई भी संासद जिस संस्था से संबंधित है उसे निधि से धन नहीं दे सकता। मंत्रियों पर भी यही बात लागू होती है। सलमान के केंद्रीय मंत्री होने का लाभ उनकी अध्यक्षता वाले ट्रस्ट को केंद्र और राज्य सरकार से मिला है इसलिए वह मंत्री रहने के हकदार नहीं रह जाते।


जापान और कई अन्य लोकतांत्रिक देशों में न केवल मंत्रियों, बल्कि प्रधानमंत्री और यहां तक कि राष्ट्रपति ने भी भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद अपना पद छोड़ा है और उनमें से कुछ जेल भी गए हैं, लेकिन भारत के सत्ताधारी अपनी जांच तक कराने को तैयार नहीं होते। जब कोई सुब्रमण्यम स्वामी या प्रशांत भूषण अदालत का दरवाजा खटखटाता है तब उनकी जांच शुरू होती है। यही नहीं अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए राजनेता उस जांच प्रक्रिया में सेंध लगा देते हैं और जल्द ही बाइज्जत बरी हो जाते हैं। राष्ट्रमंडल खेल घोटाला और 2जी स्पेक्ट्रम के उदाहरण सामने हैं। अब कोयला घोटाला हो या वीरभद्र सिंह, सलमान खुर्शीद और रॉबर्ट वाड्रा का मामला, इसे न्यायालय में ले जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि किसी राजनीतिक दल में इतना दम नहीं है कि वह अपने कैडर को जेल जाने के लिए तैयार कर सके। यह जिम्मेदारी भाजपा पर सबसे अधिक है क्योंकि वह मुख्य विपक्षी दल है। बिना सत्याग्रह करे, जेल भरे जनता पूरी तरह से घोटाले के अपराधियों को चुनावी दंड नहीं देगी। जहां तक न्यायालय का सवाल है उसमें मामलों को लटकाए रखने की बहुत-सी तिकड़में हैं। कुछ माह पहले कांग्रेस के एक राज्यसभा सदस्य मणिशंकर अय्यर ने साक्षात्कार में कहा था कि यदि आपको कुछ काम करवाना है तो पहले अहमद पटेल से मिलिए। जब अहमद पटेल से ही मिलना मुश्किल है तो दस जनपथ तक पहुंच कैसे हो सकती है? उन्होंने आम कांग्रेसजनों की भावना को अभिव्यक्त किया है। लेकिन अधिकांश नेताओं में वह साहस नहीं जो कभी महावीर त्यागी, चंद्रशेखर, रामधन कृष्णकांत या मोहन धारिया ने दिखाया था। सोनिया गांधी ने अपने साथ-साथ कांग्रेस की छवि इतनी गिरा दी है कि उनके राजकुमार की गुजरात में चुनाव प्रचार के लिए जाने की हिम्मत नहीं पड़ रही है। सत्ता के प्रति ऐसी भावना कभी नहीं थी। टिहरी उपचुनाव ने यह साबित कर दिया है कि धनबल, बाहुबल आदि से मतदाता को बरगलाया नहीं जा सकता। कांग्रेस तो सत्ता से बाहर हो ही जाएगी। लेकिन सवाल कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने भर का नहीं है। ऐसा विकल्प देने का है जिसमें सत्ता का उपयोग जनहित में हो, न कि व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धी में।


लेखक राजनाथ सिंह सूर्य  पूर्व सांसद हैं ।


Tag :प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह , भारत , भ्रष्टाचार , संप्रग-2 , सविनय अवज्ञा आंदोलन , विकल्प का संकट  ,   सिविल नाफरमानी , संपूर्ण क्रांति, जनहित , व्यक्तिगत स्वार्थ , राज्यसभा , कांग्रेस,India , Prime Minister of India, Prime Minister Of India , Manmohan Singh



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