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हताशा बढ़ाने वाला विचार

Posted On: 16 Nov, 2012 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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Hridaynarayan Dixitकांग्रेसी आंखों की किरकिरी है कैग। कैग यानी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक भारत के सार्वजनिक धन का पहरेदार है। वह देखता है कि संचित निधि का खर्च संविधान, कानून व नियमों के अधीन ही होना चाहिए। संविधान निर्माताओं ने इसे स्वतंत्र व शक्ति संपन्न संस्था बनाया था, लेकिन कैग की टिप्पणियां कांग्रेस को रास नहीं आतीं। कैग ने 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले की पोल खोली। राष्ट्रमंडल खेल आयोजनों पर कैग की रिपोर्ट से केंद्र व कांग्रेस परेशानी में फंसे। कोयला घोटाले पर कैग की रिपोर्ट से प्रधानमंत्री भी विपक्ष के निशाने पर आए। कांग्रेस केएक महामंत्री ने कैग पदधारक विनोद राय को राजनीतिक महत्वाकांक्षी बता डाला। कैग से केंद्र व कांग्रेस की चिढ़ पुरानी है। बोफोर्स तोप सौदे की पोल भी कैग ने ही खोली थी। राजीव गांधी सरकार के विरुद्ध आज जैसा ही विरोधी वातावरण था। 1962 की कैग रिपोर्ट में जीप खरीद को लेकर वीके कृष्णमेनन बुरे फंसे थे। कैग ने भ्रष्टाचार पर हजारों टिप्पणियां की हैं। सो कैग पर भी तमाम तरह की टिप्पणियां हैं। मर्यादा के उपदेश हैं, लेकिन शीर्ष भ्रष्टाचार से आजिज भारत के लोग कैग को और अधिकार संपन्न देखना चाहते हैं। कैग की नियुक्ति में पारदर्शिता की भी मांग की जा रही है, लेकिन केंद्र कैग की हैसियत घटाना चाहता है।


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प्रधानमंत्री से संबद्ध राज्यमंत्री नारायण सामी ने कैग को बहुसदस्यीय बनाने की सरकारी इच्छा व्यक्त की थी। मुख्य विपक्षी भाजपा के साथ अधिकांश विरोधी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। सामी बयान से पलट गए। मंत्री के अनुसार उन्होंने कैग को बहुसदस्यीय बनाने की शुंगलू समिति की सिफारिशों पर बात की थी। आश्चर्यजनक है कि राष्ट्रमंडल घोटाले की जांच के लिए गठित समिति ने कैग को बहुसदस्यीय बनाने की सिफारिश क्यों की? कैग की स्वतंत्रता कांग्रेस को अखरती है, लेकिन कैग की रिपोर्ट में मनमानापन नहीं होता। रिपोर्ट संसद में रखी जाती है। संसद की ही समिति पीएसी कैग रिपोर्ट के हर पहलू का विश्लेषण करती है। कैग संसद के प्रति जवाबदेह है। उसे गैरजिम्मेदार नहीं कहा जा सकता। संप्रति कैग की नियुक्ति प्रधानमंत्री के प्रस्ताव पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। लालकृष्ण आडवाणी ने नियुक्ति को पारदर्शी बनाने के लिए बीते जून में एक प्रस्ताव किया था। आडवाणी ने प्रधानमंत्री, कानून मंत्री, संसद के दोनों सदनों के प्रतिपक्षी नेता व सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश वाली एक चयन समिति के जरिये कैग नियुक्ति का सुझाव दिया था, लेकिन प्रधानमंत्री ने उक्त प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। प्रधानमंत्री के अनुसार कैग रिपोर्ट के परीक्षण में लोकलेखा समिति के जरिये विपक्ष को अपनी भूमिका के अवसर पहले से ही मिल रहे हैं। इसलिए कैग नियुक्ति की विधि में किसी बदलाव की कोई जरूरत नहीं है। प्रधानमंत्री ने कैग नियुक्ति में पारदर्शिता की विपक्षी मांग को विपक्ष की भूमिका के अवसर से जोड़ कर गलती की है। विपक्ष इसे और पारदर्शी व प्रामाणिक बनाने की मांग कर रहा है।


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कोई भी दल स्थायी सत्तापक्ष या स्थायी प्रतिपक्ष नहीं होता। जो आज सत्तापक्ष में हैं वे निकट भविष्य में प्रतिपक्षी होंगे। संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती दोनों का राष्ट्रीय कर्तव्य है। संवैधानिक संस्थाओं में आसीन महानुभावों को सत्ता व प्रतिपक्ष सहित संपूर्ण राष्ट्र का विश्वास चाहिए। कैग नियुक्ति के विपक्षी दलों के प्रस्ताव में सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश की भी राय को शामिल किए जाने की महत्वपूर्ण मांग थी, लेकिन प्रधानमंत्री ने समूचे प्रस्ताव को ही खारिज कर दिया। जाहिर है कि प्रधानमंत्री कैग नियुक्ति में परिपूर्ण पारदर्शिता और राष्ट्रीय विश्वसनीयता नहीं चाहते। कांग्रेस कैग से उलझन में है। वह पसंदीदा कैग चाहती है। इसे बहुसदस्यीय बनाने की सोच इसी धारणा का नतीजा है। सार्वजनिक धन सत्तारूढ़ दल की निजी संपदा नहीं होता। राजकोष करदाताओं का धन है। इसे जनता की इच्छानुसार ही खर्च किया जाना चाहिए। संसद जनता की इच्छानुसार बजट पारित करती है। कार्यपालिका खर्च करती है। योजनाओं का आवंटन और व्यय कानून और नियमों में ही होता है, लेकिन बीच में अनियमितताएं और भ्रष्टाचार भी होते हैं। संविधान निर्माताओं ने इसीलिए कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल ऑफ इंडिया नाम की स्वतंत्र संस्था बनाई। डॉ. अंबेडकर ने संविधान सभा में कैग को भारतीय संविधान में सबसे महत्वपूर्ण पदधारक बताया था। कैग का काम बड़ा है। वह केंद्र और राज्य, दोनों के लेखे जांचता है। लगभग 50 हजार कर्मियों व अधिकारियों से लैस कैग भ्रष्टाचार ही नहीं, फिजूलखर्ची पर भी टिप्पणी करता है। फिजूलखर्ची की टिप्पणी को नीतिगत अतिक्रमण कहा जाता है, लेकिन राष्ट्रपति आर. वेंकटरमन ने भी कहा था कि कैग को फिजूलखर्ची पर निगाह रखनी है। केंद्र को कैग की तमाम टिप्पणियों में नीतिगत अतिक्रमण की गंध आती है। कांग्रेस और सरकार खफा होती हैं। बेजा टिप्पणियां होती हैं। जैसे वर्तमान कैग विनोद राय को महत्वाकांक्षी कहा गया वैसे ही बोफोर्स तोप सौदे के समय तत्कालीन कैग टीएन चतुर्वेदी को एनकेपी साल्वे ने चार्ली-मसखरा तक कह डाला था, लेकिन कैग संस्तुतियों का प्रशंसनीय इतिहास है। कैग ने आपातकाल में चेन्नई में पानी के पाइपों के करार पर टिप्पणी कीं।


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इसी रिपोर्ट के आधार पर केंद्र ने तमिलनाडु की सरकार बर्खास्त कर दी थी। गनी खान चौधरी कैग रिपोर्ट के चलते ही रेल मंत्रालय खो बैठे थे। स्वाधीन भारत के 65 बरस बीत गए। अरबों-खरबों का धन बह गया। बावजूद इसके 80 फीसद जन अभी भी गरीब हैं। भ्रष्टाचार संस्थागत हुआ है। संवैधानिक संस्थाएं आशा और धीरज नहीं देतीं। केंद्रीय सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति को न्यायालय ने गलत ठहराया था। सीबीआइ जैसी संस्था भी कांग्रेस ब्यूरो ऑफ इनवेस्टीगेशन कही जा रही है। ऐसे हताश और निराश वातावरण में कैग की भूमिका प्रशंसनीय है। वह सार्वजनिक धन का नियंत्रक और महालेखाकार है। निगरानीकर्ता के रूप में उसकी शक्तियां व्यापक हैं, लेकिन नियंत्रक के रूप में कम। इंग्लैंड का निंयत्रक महालेखा परीक्षक लोकधन की प्राप्ति पर भी नियंत्रण करता है। वह समस्त लोक राजस्व को बैंक ऑफ इंग्लैंड में जमा करने की भी जांच करता है। इंग्लैंड में इस धन से विधिक प्राधिकार के बिना कुछ भी नहीं निकाला जाता। शासन भी नियंत्रक के प्राधिकार से ही धन निकाल सकता है। वह विधिक औचित्य जांच कर ही ऐसी अनुमति देता है। इंग्लैंड में जांच का काम प्रारंभ से ही होता है। भारत में खर्च के बाद विधिक व्यय की परीक्षा होती है। इंग्लैंड में अप्राधिकृत प्रयोजन के लिए धन नहीं निकाला जा सकता। यहां धन निकलता है, खर्च होता है, तब जांच होती है। भारत भ्रष्टाचार की चुनौतियों से जूझ रहा है। उसे कैग को शक्तिशाली बनाने के लिए नियुक्ति में पारदर्शिता सहित सभी उपायों पर विचार करना चाहिए।


लेखक हृदयनारायण दीक्षित उप्र विधान परिषद के सदस्य हैं


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Tags:Congress, Politics, Sonia Gandhi, Prime Minister Manmohan Singh, Manmohan Singh, Rahul Gandhi, CAG,सोनिया गांधी,   कांग्रेस, भ्रष्टाचार , रिलायंस , मनमोहन सिंह



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