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फांसी नहीं है आखिरी समाधान

Posted On: 20 Dec, 2012 में

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दिल्ली में दरिंदगी की दहला देने वाली घटना के बाद जो माहौल दिखा है, वह कोई पहली बार नहीं दिखा। पिछले डेढ़ दशकों में करीब आधा दर्जन से ज्यादा बार दिल्ली इस तरह के झकझोर देने वाले माहौल से गुजर चुकी है। पिछले डेढ़ दशकों में दिल्ली कई बार उबली है। कई बार शर्मसार हुई है। कई बार मोमबत्तियों की रोशनी के साथ एकजुट हुई है, लेकिन खीझ और हताशा यही है कि बार-बार ऐसे मौकों की पुनरावृत्ति हो रही है। सवाल है कि गुस्से से उबल रहा देश इसकी पुनरावृत्ति के लिए क्यों मजबूर हो रहा है? आखिर दरिंदे इतने बेखौफ क्यों हैं? उन्हें कोई डर, अपराधबोध या चिंता क्यों नहीं होती? क्यों किसी प्रियदर्शिनी मट्टू, किसी मेडिकल कॉलेज की छात्रा, किसी कॉल सेंटर की कर्मचारी के साथ बर्बर दरिंदगी की घटना के कुछ महीनों बाद ही फिर उससे भी बड़ी दरिंदगी की घटना घट जाती है? इन सवालों पर सोचना ही होगा, क्योंकि ये सवाल बार-बार हमारे गुस्से को आईना दिखाते हंै। क्योंकि ये सवाल बार-बार हमारे गुस्से को नपुंसक ठहराते हैं। आखिर गुस्से में कोई शर्मसार देश क्या करे कि अगली बार उसे फिर शर्मसार न होना पड़े। अगर हम उबल रहे गुस्से और नफरत के बीच थोड़ी शांति से इस सवाल पर विचार करें तो जिस नतीजे पर पहुंचते हैं, वे हमें आश्वस्त नहीं करते कि फिर हमें किसी झकझोर देने वाली दरिंदगी से दो चार नहीं होना पड़ेगा। दरअसल, अपराध महज हिम्मत का नतीजा नहीं होता।


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मनोवैज्ञानिक हमेशा से बताते रहे हैं कि अपराधी सबसे कम हिम्मती होते हैं। अपराध महज कानून से नहीं रुकते, क्योंकि अगर सख्त कानून और कठोर सजा इतने ही प्रभावी हथियार होते तो अमेरिका में पिछले 30 सालों में 400 फीसद अपराधियों में इजाफा नहीं होता। मध्य-पूर्व के देशों में अपराध का नामोनिशान न होता, क्योंकि वहां आज भी सख्ती के नाम पर तमाम बर्बर सजाएं मौजूद हैं। दरअसल, अपराध के लिए हिम्मत या दुस्साहस तभी पस्त होता है, जब उसके लिए सामाजिक माहौल हो। मैं कभी नहीं कहूंगा कि सख्त कानून न हों और इस तर्क को भी ढाल नहीं बनाऊंगा कि लड़कियों, महिलाओं को अपने विरुद्ध होने वाले अपराधों के लिए सजग रहना चाहिए। सजगता कोई विकल्प नहीं है। हर समय सजग रहने का मतलब है हर समय डरे हुए रहना और अपनी तमाम मासूमियतों का कत्ल कर देना। डर कर न तो रहा जा सकता है और न जिया जा सकता है। इसलिए सजगता, सहजता से जितनी निभाई जा सके, उतनी तो ठीक है, लेकिन इसे बोझ बनाना कतई सही नहीं है। सवाल यह है कि फिर हो क्या, जिससे हमें कुछ-कुछ महीनों या सालों बाद फिर से उसी शर्मसार कर देने वाली दरिंदगी से दो चार न होना पड़े? हमें फिर से उसी अपराधबोध के मोड़ से न गुजरना पड़े, जहां प्रतिक्रिया के लिए शब्द खो जाते हों या फिर चीख बन जाते हों। इसमें कोई दो राय नहीं है कि हमारा गुस्सा या दिल्ली का उबाल नकली नहीं है। गुस्सा, एकजुटता और खीझ सब कुछ सही है, असली है। पर दिक्कत यह है कि यह सिर्फ एक झोंके की तरह आता है और वैसे ही चला जाता है।


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हम सचमुच बेहद भावुक लोग हैं। जिसने भी कहा था हम ऊंघते हुए उनींदे लोग हैं, उसने सही कहा था। उसे अपने कहे में यह भी जोड़ देना चाहिए कि किसी बड़े धमाके से हम कुछ क्षणों के लिए सजग होते हैं, चौकन्ना होते हैं और फिर पुरानी पिनक वाली मदहोशी में लौट जाते हैं। यह हिंदुस्तान के लिए सबसे निर्णायक वक्त है। बार-बार हम शर्मसार होते हैं। यह और कितने दिन चलेगा? वक्त आ गया है कि हम अपने समाज के उस कमजोर हिस्से में चोट करें, जिसके बिना इसमें कोई परिवर्तन होना संभव नहीं है। दरअसल, दिखने में भले लगे कि औरतों के विरुद्ध होने वाले अपराध एक खास प्रवृत्ति के नतीजे हैं, पर वास्तव में हैं नहीं। महिलाओं के विरुद्ध इन घिनौने अपराधों की जटिल गर्भनाल हमारे समाजबोध से ही खाद, पानी हासिल करती है। महिलाओं के विरुद्ध घिनौने अपराध की मानसिकता आसमान से नहीं टपकती, बल्कि हर समय उन छोटे-छोटे लम्हों में हमारे इर्दगिर्द ही पलती, बढ़ती है, जिन्हें हम या तो समझना ही नहीं चाहते या फिर समझकर भी उनकी अनदेखी करते हैं। दरअसल, जब हम पड़ोसी की लड़की की आजाद ख्याली को उसके चरित्र से जोड़ते हैं या कोई जोड़ रहा हो तो मुस्कुरा देते हैं, तब हम सिर्फ औरतों के विरुद्ध ही नहीं, तमाम कमजोर लोगों के विरुद्ध दरिंदगी की नींव रख रहे होते हैं। जब तक हम उन मौकों पर अपनी प्रतिक्रियाओं को ईमानदार नहीं बनाएंगे, तब तक हम झकझोर देने वाली दरिंदगियों का सिर्फ इंतजार करेंगे।



लेखक लोकमित्र  स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं



Tag: rape, rape in delhi,women,women in society,मनोवैज्ञानिक,hanging,gallows,फांसी



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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Pallav Tripathi के द्वारा
December 27, 2012

कानून के नजरो में बलात्कार के लिए फंसी की सजा नहीं किन्तु बलात्कारियो के लिए फंसी से कम कोई सजा हो ही नहीं सकती..


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