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जागरण मेहमान कोना

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नैतिक मूल्यों का पतन

पोस्टेड ओन: 3 Jan, 2013  में

rajnath suryaदिल्ली में सामूहिक दुष्कर्म की शिकार युवती की मौत से उपजा देशव्यापी क्षोभ और रोष बने रहना चाहिए। यह इसलिए भी जरूरी है ताकि मौजूदा पाशविक समाज को मानव समाज में तब्दील किया जा सके। अपराध कम किया जा सके। हमारी सामाजिक, राजनीतिक व्यवस्था भी ऐसी है कि किसी आरोपी को दोषी घोषित किए जाने तक उसे अपराधी नहींमाना जाता। न्यायालय में अपराध सिद्ध होने की प्रक्रिया में बीस-बीस वर्ष लग जाते हैं। कई बार तो सबूत के अभाव में अपराधी बाइज्जत बरी हो जाते हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि जिस राष्ट्रीय दल ने अपने प्रवक्ता को यौन शोषण में लिप्त होने के कारण प्रवक्ता पद से हटा दिया था, आजकल उन्हीं के मजबूत कंधों पर यौन शोषण के खिलाफ जागरूकता फैलाने का जिम्मा है। पिछले महीने की दरिंदगी के खिलाफ जो रोष प्रकट हुआ है, उससे कहीं अधिक भ्रष्टाचार के खिलाफ सामने आ चुका है, लेकिन क्या उसके बाद भ्रष्टाचार जरा भी रुक सका है या भ्रष्टाचारियों को दंड मिला है? इस दरिंदगी के खिलाफ उपजे आक्रोश के बाद भी दुष्कर्म की घटनाएं कम नहीं हुई हैं।


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जिस दिन वह लड़की जीवन का अंतिम संघर्ष कर रही थी, उसी दिन दिल्ली में ही एक और चलती बस में वैसे ही दुष्कर्म को दोहराने का प्रयास हुआ। समाज का आक्रोश इन दुष्कर्मियों को भयभीत करने में क्यों सफल नहीं हो रहा है? इसलिए सफल नहीं हो रहा है, क्योंकि जीवन मूल्यों और मर्यादा को हमने दफन कर दिया है। अपराध नियंत्रण के लिए कानून हैं, फिर भी उनमें कमी नहीं आ रही है तो क्या दुष्कर्म के कानून कड़े कर देने से तस्वीर बदलेगी? क्या इससे पहले किसी दुष्कर्मी को मृत्युदंड नहीं दिया गया? फिर कैसे कहा जा सकता है कि इन अपराधियों को मृत्युदंड देने से कुछ बदल जाएगा? अमेरिका और दूसरे पाश्चात्य देशों में जहां मुक्त यौन सबंधों को सामाजिक मान्यता है उसकी संस्कृति (या विकृति) को भारत लाने के प्रयासों में अभी तक लिवइन रिलेशनशिप और समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से मुक्त किया जा चुका है। उत्तेजक पहनावे और कामुकता को बढ़ावा देने वाला सिनेमा या धारावाहिक प्रगतिशीलता का प्रतीक मान लिया गया है। पहले पर्दे पर नृत्यांगना आती थी अब उनकी जगह आइटम गर्ल ने ले ली है। संस्कृत में एक सूक्ति है, जिसका भाव यह है कि मनुष्य और पशु समान प्रवृत्ति के होते हैं, बस धर्म और कर्तव्य का अहसास ही मनुष्य को पशु से भिन्न रखता है। कर्तव्य की प्रवृत्ति का अहसास होने के कारण अब समाज पाशविकता की ओर बढ़ रहा है। इसलिए उस युवती ने समाज में जो लौ जगाई है, जो रोष और क्षोभ पैदा किया है, उसमें स्थायी भाव तभी आ सकता है जब हम अपनी संस्कृति की ओर लौटें।



संस्कार देने का प्रथम केंद्र परिवार होता है। भौतिक भूख की ललक बढ़ते जाने के कारण पारिवारिक संस्कारों की परंपरा लुप्त होती जा रही है। परिवार का तात्पर्य माता-पिता और संतान भर रह गया है। पति-पत्नी दोनों के कमाने पर ही भरण-पोषण संभव है के माहौल ने जो व्यस्तता बढ़ाई है, उसने बच्चों को स्कूल भेजने और कोचिंग कराने पर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली है। युवाओं में मुक्त संबंधों की पैठ बढ़ती जा रही है। इसके दुष्परिणाम भी सामने आ रहे हैं। मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघरों में पुजारी, मौलवी और पादरी तक यौन शोषण में लिप्त क्यों पाए जा रहे हैं? क्यों पिता-पुत्री के दुष्कर्र्मो के मामले बढ़ते जा रहे हैं? इसलिए बढ़ रहे हैं क्योंकि हम समाज को मर्यादाविहीन बनाते जा रहे हैं। मर्यादा को पुराणपंथी कहकर हीन साबित किया जा रहा है। नैतिक मूल्य शून्य हो गए हैं। जिन पर सुशासन की जिम्मेदारी है वे मुंहअंधेरे शव लेने तो पहुंच जाते हैं, लेकिन भरी दोपहरी में जनता से मिलने में घबराते हैं। हमारे राष्ट्रपति से लेकर प्रत्येक जनप्रतिनिधि और रोष से भरी युवा पीढ़ी ने उस युवती की मौत से उत्पन्न बदलाव की लौ को बुझने न देने का संकल्प जताया है, लेकिन क्या संकल्प ले लेने भर से चीजें बदल जाएंगी? समाज की मान्यता रही है कि वाणी से अधिक आचरण का प्रभाव पड़ता है। जैसे पानी स्वाभाविक रूप से नीचे की ओर बहता है, ऊपर चढ़ाने के लिए प्रयास करना पड़ता है, ठीक वैसा ही आचरण के साथ है।


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आचरण को ऊपर ले जाने का प्रयास कहां हो रहा है? यहां तक कि शिक्षण संस्थाओं में नैतिक शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल करने का दिखावटी प्रयास तक नहीं हो रहा है। हमारी सत्ता के संचालक तो जो आचरण कर रहे हैं उसमें सिर्फ इतना ही संभव है कि उस युवती का परिचय दिया जा सके। उसका परिचय सार्वजनिक कर देने से क्या समाज निर्मल हो जाए? नहीं, समाज को निर्भय और निर्मल बनाने के लिए संस्कारों को प्राथमिकता देनी होगी जो परिवार से शुरू होती है और शिक्षण संस्थाओं में जिसे धार प्रदान की जाती है। किसी भी समस्या के मूल को भूलकर उसका समाधान नहीं किया जा सकता है। उस युवती को सच्ची श्रद्धांजलि अपने संस्कारों की ओर लौटना होगी। आज की परिस्थिति में जहां ढोंग संक्रामक रोग की तरह फैल गया है, युवा पीढ़ी में मर्यादा की समझ को विकसित करने की आवश्यकता है। उसका भविष्य संयम में सुरक्षित है, उन्मुक्तता में नहीं। अन्यथा यह जागरूकता क्षणिक ही साबित होगी।



लेखक राजनाथ सिंह सूर्य राज्यसभा के पूर्व सदस्य हैं


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