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चीन में बढ़ता पूंजीवादी दखल

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चीन में साम्यवाद के बावजूद वहां के अमीर कहीं ज्यादा सत्ता पर काबिज हो रहे हैं और अपना व्यापार लगातार बढ़ा रहे हैं। लगभग दो दशक पहले चीन ने आर्थिक नीति में बदलाव करते हुए विदेशी पूंजी को आने की तो अनुमति दी ही, चीनी लागों को भी पूंजी निवेश करते हुए उत्पादन तंत्र के स्वामित्व में हिस्सेदारी दी जाने लगी। फो‌र्ब्स पत्रिका की ओर से जारी अरबपतियों की सूची (2012) के मुताबिक दुनिया में कुल 1226 अरबपतियों में 133 अरबपति चीन से हैं। इस सूची में भारत के सिर्फ 48 अरबपति हैं। हालांकि उनकी परिसंपत्ति चीनी अरबपतियों से थोड़ी अधिक है, लेकिन चीन में अरबपतियों की संख्या लगातार बढ़ती भी जा रही है। बात सिर्फ इस संख्या के बढ़ने की नहीं है, सत्ता पर भी उनके बढ़ते प्रभाव की भी है। चीन में साम्यवादी क्रांति के बाद माओत्सेतुंग के नेतृत्व में चीन के अर्थतंत्र में बुनियादी बदलाव आया। कृषि क्षेत्र की भूमि सरकार ने अधिग्रहीत कर ली और सामूहिक खेती होने लगी। फैक्ट्री उत्पादन तंत्र पर सरकार काबिज हो गई और पूरी अर्थव्यवस्था सरकारी क्षेत्र के प्रतिष्ठानों के हाथ में केंद्रित हो गई।


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केंद्रीय योजना बनाकर समस्त अर्थव्यवस्था का संचालन चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के हाथ में चला गया। शासन की डोर कम्युनिस्ट पार्टी के हाथ में इस प्रकार आ गई कि उस व्यवस्था पर उंगली उठाने वाले बर्दाश्त से बाहर हो गए। कम्युनिस्ट पार्टी का निरंकुश शासन चीन पर स्थापित हो गया। लोकतंत्र की मांग करने वाले हजारों विद्यार्थियों और युवाओं को गोलियों से भून तक दिया गया, लेकिन आज कम्युनिस्ट शासन वाले इस देश में पूंजीपतियों का बोलबाला होने लगा है। एक ओर चीन में गरीब और अमीर के बीच की खाई बढ़ रही है तो दूसरी ओर यह भी साफ हो रहा है कि राजनेताओं के परिजनों ने भारी संपत्ति जुटा ली है। व्यवसायियों के साथ उनके रिश्ते लगातार बढ़ते जा रहे हैं। व्यवसायी और औद्योगिक हस्तियां भी अपने इन रिश्तों पर काफी इतराते दिखाई देते हैं। होंगडाऊ समूह कंपनी के अध्यक्ष झाऊ कम से कम दस राजनीतिक पदों पर आसीन हैं। उन्होंने खुद स्वीकार किया है उनके राजनीतिक संबंधों के कारण उन्हें व्यवसायियों, राजनीतिक हस्तियों और सैन्य अधिकारियों से मिलने का मौका मिलता रहता है। इन मुलाकातों के दौरान उन्हें जब भी मौका मिलता है, वह टैक्स घटाने की वकालत करते हैं। वह इस बात का भी दंभ भरते हैं कि उन्होंने राष्ट्रपति वेन जियाबाओ पर खुद यह दबाव बनाया कि वह ब्रांड विकसित करने वाली फर्र्मो को भी प्रौद्योगिकी कर की छूट दें। झाऊ का कहना है कि जब वर्ष 2008 में उनके पिता विधायिका से सेवानिवृत्त हुए तो उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी की कांग्रेस में आमंत्रित किया गया था।



इस परिवार ने पिछले 30 सालों में वुकसी शहर के आसपास भारी मात्रा में कृषि भूमि पर आधिपत्य कर 100 कंपनियां स्थापित कर लिया और अपनी कंपनी का विस्तार किया है। इसमें एक हॉल बनाया गया है, जिसमें कम्युनिस्ट नेताओं को सम्मानित किया जाता है। झाऊ के होंगडाऊ समूह ने सरकार से अनुमति प्राप्त कर एक वित्तीय कंपनी भी स्थापित की है और कंबोडिया में अपने व्यवसाय का विस्तार किया है। झाऊ अपनी राजनीतिक गतिविधि को कुछ इस तरह समझाते हैं, मैं निजी उद्यमों के प्रतिनिधि के नाते काम कर रहा हूं। चीन की जनता में बढ़ती असमानताओं को लेकर काफी रोष है। यह रोष ज्यादा इसलिए भी है क्योंकि अमीरों के बढ़ते दबदबे के कारण, केवल गैर बराबरी ही नहीं बढ़ रही, बल्कि महंगाई, घटिया खाद्य पदार्थ और बढ़ता प्रदूषण भी इसी कारण है। आज हालात ये हैं कि सरकारी नीतियां सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टी के नेता ही नहीं बनाते हैं, उनमें चीनी नेताओं के साथ मेलजोल बढ़ाने वाले देश के अमीर वर्ग का भी खासा दखल होता है।


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वर्ष 2012 की हुरून रिपोर्ट में संकलित सर्वाधिक अमीर चीनियों की सूची में से कम से कम 75 लोग चीन की 3000 लोगों की संसद में शामिल हैं। इतने अमीर शायद ही विश्व की किसी संसद में शामिल हों। यों तो सभी अमीर चीनी राजनीतिक हस्तियों से मेलजोल रखते हुए अपनी संपत्ति लगातार बढ़ाते रहते हैं और राजनीति में दखल रखने वाले चीनी अपने वारे-न्यारे कर रहे हैं। शंघाई की शोध कंपनी हुरून की इस रिपोर्ट में 2007 से 2012 तक पांच वर्षों के दौरान संसद सदस्यों की संपत्ति में हुई बढ़ोतरी दिखाई गई है। 1.5 अरब डॉलर से ज्यादा की संपत्ति वाले संसद सदस्यों की परिसंपत्ति 81 फीसद बढ़ी है, जबकि राजनीतिक हैसियत न रखने वाले अमीर चीनियों की परिसंपत्तियों में मात्र 47 प्रतिशत की ही बढ़ोतरी हो पाई है। चाइनीज पीपुल्स पॉलिटिकल कंसल्टेटिव कॉन्फें्रस (सीपीपीसीसी) कम्युनिस्ट पार्टी और संसद की सलाहकार परिषद है। इसमें लगभग 2200 सदस्य होते हैं। इसमें चीन की समस्त जनसंख्या का प्रतिनिधित्व अपेक्षित है, जिसमें ऐसे लोग शामिल होते हैं जो कम्युनिस्ट पार्टी से संबद्ध नहीं होते। व्यावहारिकता में इसका काम सरकारी कामकाज में सहयोग करना होता है। इस परिषद में शामिल 74 ऐसे लोग हैं, जो अमीरों की हुरून सूची में शामिल थे और जिनकी औसत संपत्ति 1.45 अरब डॉलर थी।



सीपीपीसीसी के कई सदस्य अमीरों की इस कॉन्फ्रेंस में भागीदारी की निंदा भी कर रहे हैं। एक सदस्य का यहां तक कहना है कि ये अमीरजादे राष्ट्रपति पर इतना दबाव बनाते कि उनकी व्यवसायिक समस्याओं का समाधान हो सके। सत्ता के गलियारों में अपना स्थान बनाते हुए ये अमीर चीनी लोग अपने दबदबे और संपर्र्को से अपने सहयोगियों को महत्वपूर्ण समितियों में रखवाते हैं और वहां की जानकारी प्राप्त कर अपने व्यवसाय को लाभ पहुंचाते हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि नीति-निर्माण में एक खास वर्ग का दखल किस हद तक बढ़ चुका है। अमीरों का दबदबा चीन में इस कदर बढ़ चुका है कि वह अमेरिकी अमीरों को भी इस मामले में पीछे छोड़ रहे हैं। अमेरिकी कांग्रेस में शामिल 535 सदस्यों की कुल संपत्ति वर्ष 2010 में मात्र 1.8 से 6.5 अरब डॉलर के बीच थी, जबकि चीन की नेशनल पीपुल्स कांग्रेस (चीनी संसद) में शामिल हुरून सूची के 75 लोगों की औसत परिसंपत्तियां एक अरब डॉलर से ज्यादा थी। चीन में अमीरों के इस प्रकार सत्ता में काबिज होने और अनाप-शनाप दौलत इकट्ठी करने को लेकर आम जनता में व्याप्त रोष अब प्रस्फुटित होने लगा है। जनता अमीर-गरीब की बढ़ती खाई के प्रति लगातार जागरूक हो रही है और इसका विरोध प्रदर्शन भी करने लगी है। इस जनजागरण और इस तरह की रिपोर्ट के सामने आने के कारण कम्युनिस्ट पार्टी का नेतृत्व भी चिंतित दिखने लगा है। बावजूद इसके सत्ता के साथ चीनी अमीरों की नजदीकियां घटती नजर नहीं आ रही हैं। नवंबर में ही बीजिंग के ग्रेट हॉल ऑफ द पीपुल में कम्युनिस्ट पार्टी की 18वीं नेशनल कांग्रेस में भी चीन की कम से कम सात सबसे अमीर हस्तियां शामिल हुई थीं।



लेखक अश्विनी महाजन स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं


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Tag:चीन,साम्यवाद, केंद्रीय योजना, कम्युनिस्ट पार्टी, महंगाई,नेशनल पीपुल्स कांग्रेस, communism,central, inflation,communist party,China,



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