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ड्रग ट्रॉयल पर संजीदा हो सरकार

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यह कोई पहली बार नहीं है, जब दवाओं के गैर कानूनी परीक्षण और उसके तौर तरीकों को लेकर अदालत ने सवाल उठाए हों। इससे पहले भी एक याचिका की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने तीखी टिप्पणी की थी कि इंसानों के साथ जानवरों की तरह सलूक करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। बावजूद इसके सरकार ने अपना रवैया नहीं बदला। इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी न तो दोषी दवा कंपनियों के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई और न ही पीडि़त मरीजों के परिवार को वाजिब मुआवजा दिया गया। बल्कि केंद्रीय दवा मानक नियंत्रण संगठन की ओर से मुआवजे के लिए जिन फार्मूलों पर आधारित नए दिशा-निर्देश तय किए जा रहे हैं, सरकार उसमें परीक्षण को अंजाम देने वाले पक्षों की ही सहूलियत का ख्याल रख रही है। मसलन, यदि दवा परीक्षण की वजह से किसी शख्स को कोई शारीरिक नुकसान पहुंचता है या उसकी मौत हो जाती है तो मुआवजे का निर्धारण उसकी उम्र, आय और रोग की गंभीरता के आकलन के आधार पर दिया जाएगा।


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सरकार के पास इस बात का शायद ही कोई जवाब हो कि पीडि़त यदि घरेलू महिला, विद्यार्थी, बच्चा या कोई बेरोजगार शख्स है तो उसके लिए कितना मुआवजा तय किया जाएगा? एक बात और, आय के मामले में जहां अधिकतम आमदनी की कोई सीमा नहीं रखी गई है, वहीं न्यूनतम मजदूरी की राशि को कम से कम आय का मानक बनाया गया है। जाहिर है, यदि यह नियम अमल में आ गए तो विभिन्न कंपनियां अपनी दवाओं के परीक्षण के लिए ज्यादातर गरीब तबके के भोले-भाले लोगों का ही चुनाव करेंगी। जिन्हें मामूली रकम देकर आसानी से चुप कराया जा सके। यही नहीं, कभी मुआवजा देने की नौबत आती भी है तो मरीज पर प्रभाव का आंकलन वे नैतिकता समितियां तय करेंगी, जिन्हें संबंधित अस्पताल नियुक्त करेंगे। कायदे से जब भी नई दवाओं का इंसानों पर परीक्षण किया जाता है तो इस परीक्षण के लिए स्वास्थ विभाग, राज्यों की नामित विशेषज्ञ कमेटी की संस्तुति और संबंधित अस्पतालों की आचार समितियों से मंजूरी जरूरी होती है। ऐसे रोगियों को लगातार विशेषज्ञ डॉक्टरों और कुशल नर्सो की निगरानी में रखना पड़ता है। यही नहीं, जिन मरीजों पर दवाओं का परीक्षण किया जाता है, उनसे भी सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करवाना लाजमी है। चूंकि ये परीक्षण तीन या चार दौर में किए जाते हैं और इसमें दवाओं के बुरे असर की आशंका से भी इन्कार नहीं किया जा सकता। लिहाजा, ऐसे में लोगों को इन परीक्षणों के लिए रजामंद करवा पाना बेहद मुश्किल काम होता है। फिर भी हमारे देश में यह परीक्षण आसानी से हो रहे हैं।



दवा निर्माता कंपनियां बिचौलियों की मदद से सरकार की ठीक नाक के नीचे यह काम कर रही हैं। बिचौलिए अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टरों को मुंह मांगी रकम देकर इसके लिए तैयार कर लेते हैं। फिर उसके बाद चोरी छिपे संबंधित दवाओं का परीक्षण किया जाता है। मध्य प्रदेश में इंदौर और भोपाल के जिन अस्पतालों में इंसानों पर यह गैर कानूनी परीक्षण हो रहे थे, वहां भी बिल्कुल यही तरीका अपनाया गया। गैर सरकारी संगठन स्वास्थ अधिकार मंच का दावा है कि इंदौर में 3300 से अधिक व्यक्तियों पर इस तरह के गैरकानूनी परीक्षण किए गए, जिसमें 15 सरकारी डॉक्टर और 10 निजी अस्पतालों के तकरीबन 40 डॉक्टर शामिल थे। संगठन ने अपनी याचिका में यहां तक इल्जाम लगाया है कि 283 मानसिक रोगियों और एक दिन से 15 साल की आयु वर्ग के 1833 बच्चों पर ये गैर कानूनी दवा परीक्षण किए गए। यह बात सच है कि क्लीनिकल ट्रॉयल एलोपैथी की बुनियाद है। दवा परीक्षण हों, मगर मरीजों की जान की शर्त पर नहीं।


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अस्पताल में अपनी छोटी-बड़ी बीमारियों के इलाज के लिए पहुंचने वाले मरीजों पर देशी-विलायती दवा कंपनियों द्वारा विकसित की जा रही दवाओं का उनकी जानकारी और इजाजत के बिना प्रयोग करना एक जघन्य अपराध है। क्लीनिकल ट्रॉयल के नाम पर देश में बरसों से जो गोरखधंधा चल रहा है, उस पर सख्ती से लगाम लगे। क्लीनिकल ट्रॉयल से जुड़े नियमों को मजबूत बनाने के लिए औषधि और प्रसाधन सामग्री नियम-1945 में संशोधन की भी दरकार है, ताकि परीक्षण के चलते मरीज को होने वाली स्वास्थ्य संबंधी समस्या या उसकी मौत के मामले में एक वाजिब मुआवजा मिल सके। यही नहीं, चिकित्सा जैसे मुकद्दस पेशे को अपने काले कारनामों से बदनाम करने वाले डॉक्टरों पर भी सख्त कार्रवाई हों।


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Tag:दवा, कानून, राज्य सरकार, केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव , sarkar, health department,



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