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कुंद न हो आरटीआइ की धार

Posted On: 10 Jan, 2013 Others में

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बिहार के नालंदा जिले के हिलसा प्रखंड के एक छोटे से गांव पखनपुर की रामपरी देवी के पति को गुजरे लगभग दो दश बीत चुके हैं। वह सरकारी मुलाजिम थे। रामपरी का गुजारा अब पेंशन होता है। बेलगाम महंगाई में पेंशन के विसंगतिपूर्ण भुगतान ने उनका जीना दूभर कर दिया है। पांचवें और छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के बाद उनकी पेंशन बढ़नी चाहिए थी, मगर ऐसा नहीं हुआ। शरीर ऐसा नहीं रहा कि सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाकर अपना हक मांग सकें। उनकी परेशानी को देखकर गांव के एक पढ़े-लिखे युवक ने उनकी मदद की। उसने सूचना का अधिकार (आरटीआइ) के तहत संबंधित बैंक में उनकी तरफ से आवेदन किया और 30 दिनों में बुजुर्ग महिला को उनका हक मिल गया। यह हाशिये पर स्थित एक महिला को अपना हक मिलने सिर्फ एक मिसाल है। आरटीआइ ने इस वर्ग को भी सशक्त किया है। यही कारण है कि इस कानून की लोकप्रियता हर दिन बढ़ती जा रही है।


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आरटीआइ कार्यकर्ता विवेक गर्ग ने आरटीआइ के तहत प्रधानमंत्री कार्यालय से एक ऐसा पत्र हासिल किया, जिससे उजागर हुआ कि पी चिदंबरम ने अपने पिछले कार्यकाल में वित्त मंत्री रहते हुए पूर्व संचार मंत्री ए. राजा को 2007-08 में 2जी स्पेक्ट्रम कौडि़यों के भाव नीलाम करने की छूट दे दी थी। केरल में पर्यावरण मामलों से जुड़े आरटीआइ कार्यकर्ता हरीष वी ने तकरीबन 1000 एकड़ वन भूमि राज्य सरकार द्वारा एक निजी कंपनी को औने-पौने दामों पर बेचे जाने से बचाया। आज आरटीआइ ने भ्रष्ट सरकारी मुलाजिमों और राजनेताओं के मन में खौफ पैदा कर दिया है। प्रतिकार में आरटीआइ कार्यकर्ताओं को धमकी मिलना तो सामान्य हो गया है, उनकी हत्या तक कर दी जाती है। 2005 में इस कानून के अत्तित्व में आने से अब तक 12 से ज्यादा कार्यकर्ताओं की हत्या की जा चुकी है। यह कानून बनने के छह साल बाद भी इसकी संकल्पना अपने प्रारंभिक चरण में है। सरकारी कर्मचारी सूचना देने को आज भी अपनाकाम नहीं मानते। नतीजतन, आवेदकों को या तो सूचना से महरूम रखा जाता है या उन्हें गलत और भ्रामक सूचना दी जाती है। पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हब्बीबुल्ला ने माना है कि केंद्र सरकार के अंतर्गत काम करने वाले विभागों में अनुभाग अधिकारियों को केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी (सीपीआइओ) बनाया जाता है, जिनके पास बहुत कम सूचना उपलब्ध होती है। इसके विपरीत इस संदर्भ में पूर्व सूचना आयुक्त शैलेष गांधी की सोच सकारात्मक है। उनका मानना है कि यदि आवेदक सटीक सवाल पूछेंगे तो लोक सूचना अधिकारी के पास आपके सवालों का सही जबाव देने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं रहेगा।



आरटीआइ एसेसमेंट एंड एनालिसिस ग्रुप और नेशनल कैंपेन फॉर पीपुल्स राइट टू इन्फॉर्मेशन द्वारा 2009 में किये गए एक राष्ट्रव्यापी शोध में पाया गया था कि औसतन 30 फीसद आवेदन लोक सूचना अधिकारी द्वारा शुरुआती दौर में ही खारिज कर दिए जाते हैं। आमतौर पर सूचना 30 दिनों में नहीं दी जाती है और अक्सर गलत व भ्रामक सूचनाएं दी जाती हैं। कई मामलों में अधिनियम की धारा 8 एवं 9 के तहत सूचना देने से मना कर दिया जाता है। यद्यपि कानूनन सूचना न देने का कारण बताना चाहिए, लेकिन आमतौर पर ऐसा किया नहीं जाता। देर से सूचना उपलब्ध करवाने पर जुर्माना महज 1.4 फीसद मामलों में ही लगाया जाता है। इसमें दोराय नहीं है कि आरटीआइ आने के बाद से सरकारी विभागों का काम बढ़ा है। काम का बोझ कम करने के लिए सरकार को हर विभाग में आरटीआइ सेल बनानी चाहिए। ऐसा नहीं है कि गलती हर बार सूचना अधिकारी की ही होती है। आवेदकों द्वारा मांगी गई सूचना भी स्पष्ट नहीं होती है।



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कई आवेदन तो 10-10 पन्नों के होते हैं। इस कारण से भी आवेदकों द्वारा मांगी गई सूचना समय-सीमा के भीतर मुहैया करवाने में परेशानी होती है। इस तरह की समस्याओं से निजात पाने के लिए ही कर्नाटक सरकार ने यह नियम बनाया है कि आरटीआइ के तहत आवेदक सूचना सिर्फ 150 शब्दों में ही मांग सकते हैं। निश्चित रूप से कर्नाटक सरकार का इस कड़ी में लिया गया यह निर्णय बेहद ही सारगर्भित है। निस्संदेह भारत में सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 को अमलीजामा पहनाना 21वीं सदी में उठाया गया एक अहम कदम है। सूचना का अधिकार कानून ने पूरे देश में क्रांति लाने का काम किया है। इस कानून को मूर्त रूप देने के बाद से सरकारी कामकाजों में व्याप्त बहुत सारी विसंगतियों का पता चला है। सरकारी उपक्रमों में पारदर्शिता लाने के प्रति लोगों में जागरूकता आई है, लेकिन इस संबंध में एक कड़वा सच यह भी है कि इस कानून को अमलीजामा पहनाने के दौरान अक्सर निजता में अनावश्यक हस्तक्षेप किया जाता है, जो लोकतंत्र के लिए घातक है।



सूचना का अधिकार अधिनियम के प्रावधानों के तहत आयकर के वैयक्तिक रिकॉर्ड को भी अब व्यक्तिगत सूचना की परिभाषा के दायरे में लाया गया है। सूचना आयुक्तों के अनुसार, यह किसी की निजता पर हमला नहीं है। इससे कर वंचना रोकने में मदद मिलती है। सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत सूचना जरूर उपलब्ध करवाई जाए, लेकिन इसके साथ इस बात का ध्यान रखा जाए कि इससे किसी की निजता प्रभावित न हो। अभी तक निजता के अधिकार को संसद ने संहिताबद्ध नहीं किया है। लिहाजा, संसद को चाहिए कि निजता के अधिकार को संहिताबद्ध करे। निजता का मामला सांस्कृतिक रूप से परिभाषित मुद्दा है। इसका अर्थ कदापि यह नहीं है कि इसके दुरुपयोग को प्रोत्साहन दिया जाए। इस कानून में व्याप्त अन्य खामियों से इन्कार नहीं किया जा सकता है। मसलन, इस कानून की सबसे बड़ी कमी है निजी क्षेत्र को इसके दायरे से बाहर रखा जाना।


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पूरे देश में निजी क्षेत्र में पारदर्शिता का भारी अभाव है। इन पर नियंत्रण रखने में सरकार पूरी तरह से विफल रही है।उदाहरण के तौर पर पटना में नर्सरी के दाखिले में निजी स्कूलों के द्वारा हर साल जमकर भ्रष्टाचार का खेल खेला जाता है। फिर भी सरकार उन पर नकेल नहीं कस पाती। इस संदर्भ में दूसरी महत्वपूर्ण कमी है, दूसरी अपील के लिए 90 दिन की समय-सीमा का मुकर्रर किया जाना। इस वजह से सही सूचना मिलने में एक लंबा समय लगने से इन्कार नहीं किया जा सकता है। इसके बरअक्स सही सूचना पाने के लिए न्यायालय की शरण में भी जाया जा सकता है, लेकिन इसमें सालों लगना आम बात है। हर कानून की तरह आरटीआइ के दुरुपयोग से भी इन्कार नहीं किया जा सकता। कई मामलों में सामने आया है कि आरटीआइ की आड़ में आवेदक लोक सूचना अधिकारी को ब्लैकमेल करते हैं। ऐसी घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इन कमियों के बावजूद आज आरटीआइ समाज के दबे-कुचले और वंचित लोगों के बीच उम्मीद की आखिरी किरण के समान है।



लेखक सतीश सिंह एक सार्वजनिक बैंक से जुड़े हैं



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Tag: आरटीआइ,R.T.I, right to information,सूचना का अधिकार अधिनियम,2005



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