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अपने भीतर झांकने का समय

Posted On: 11 Jan, 2013 Others में

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दिल्ली सामूहिक दुष्कर्म के बाद उपजे आक्रोश ने सामाजिक जागरूकता फैलाने का काम किया। मीडिया ने इसमें अहम भूमिका अदा की। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने भी उस युवती को भावभीनी श्रद्धांजलि दी। स्क्रीन पर पीडि़ता की कहानी बयां की जा रही थी और उसके सामने मेरे जैसे सैकड़ों लोगों के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। मैं एंकर के साथ पूरी खबर में डूबी हुई थी और मेरे जज्बात भी उसी दिशा में बह रहे थे, लेकिन एंकर ब्रेक लेता है और मेरे जज्बातों पर एक हथौड़ा-सा पड़ता है। एड था, समुद्र किनारे बैठे एक आदमी के पास बिकिनी पहने लड़की कामुक अदा में आती है और पलटकर चली जाती है। वह आदमी उसे जाते हुए पीछे से खा जाने वाली नजरों से देखता है और उसके बगल में सन बाथ लेता दूसरा आदमी पहले आदमी को ऐसे देखता है मानो उसने कोई किला फतह कर लिया हो। इस बात पर वह भी अपनी फतह प्रदर्शित करने के लिए कंधे उठा देता है।


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यही है हमारे समाज का असली चेहरा। खबर देखते-देखते मेरे मन में समाज की छवि बनती आई थी वह टूटी तो नहीं, उसमें एक दरार जरूर पड़ गई। आखिर जिस जमाने में हम रह रहे हैं वहां हम कैसे उम्मीद करें कि अचानक सब ठीक हो जाएगा? एक तरफ हमारे चैनल अचानक ही महिला की स्थिति सुधारने की मुहिम छेड़ते हैं और अगले ही पल खुद ही उसे तोड़ देते हैं। शायद ही कोई विज्ञापन हो जिसमें स्त्री जाति को उपभोग की वस्तु के तौर पर न दिखाया जाता हो। आज हम इंटरनेट के सेक्स बाजार वाला समाज गढ़ रहे हैं और उसमें जी भी रहे हैं। उस समाज में भी पुरुष खरीदार है और लड़की वही वस्तु। ऐसी कितनी ही वस्तुओं से हर दिन सेक्स खरीदने के नाम पर भुगतान किया जाता है या शादी के नाम पर सामाजिक रूप से स्वीकृत परंपरा के नाम पर दहेज के लिए प्रताडि़त किया जाता है। राह चलते छिछोरे गालियों में मनसा-वाचा दुष्कर्म करते हैं।



भारत सेक्स टूरिज्म का नया बाजार बनता जा रहा है। बच्चे-बच्चे तक पॉर्न की पहुंच आसान होती जा रही है। यहां आइटम गर्ल अपनी जवानी के जलवों की कहानी कहते नहीं थकतीं। एक पॉर्न स्टार को उसके खराब लहजे के बावजूद रातों रात हिंदी फिल्म उद्योग में बड़ा ब्रेक मिल जाता है। इंटरनेट पर सबसे ज्यादा सर्च की जाने वाली शख्सियत का खिताब उसे मिल जाता है और वह सेलेब्रिटी बन जाती है। क्या खबर लहरिया निकालने वाली महिलाओं को कभी इतना कवरेज दिया गया, जिन्होंने उत्तर प्रदेश के चित्रकूट और बांदा जिले में एक नई तरह की सूचना क्रांति का सूत्रपात किया? हर दिन प्रसारित किया जाता है कि किस किस अभिनेत्री को एक विज्ञापन के एवज में कितने करोड़ मिले। इससे क्या संदेश देना चाहते हैं? यही कि खुद को उपभोग की वस्तु बना देने पर शोहरत उनका इंतजार कर रही है? देश की अंतरात्मा को झकझोर देने वाली इस घटना के बाद हुए आंदोलन से भी कुछ सवाल पूछे जाने चाहिए। इंसाफ की गुहार किससे है? उस सरकार से जिसके नेता खुद महिलाओं पर आपत्तिजनक टिप्पणियां करते हैं? जिसके नेता खुद उन्हें वस्तु से ज्यादा कुछ नहीं समझते? एक तरफ समाज में नारी की स्थिति सुधारने के लिए आंदोलन हो रहे थे तो दूसरी तरफ यही नेता सैफई महोत्सव में अभिनेत्रियों व सह अभिनेत्रियों से आइटम करा रहे थे। या फिर उस पुलिस से, जिसके कर्मचारी खुद हमारे ही समाज का हिस्सा हैं? इसी आंदोलन में कई लोगों ने तो ये पोस्टर तक उठाए कि भारत जैसे देश में पैदा होने पर उन्हें अफसोस है। यदि ऐसा है तो बाकी देशों के आकड़ों पर भी गौर किया जाना चाहिए। अमेरिका में हर दो मिनट में एक दुष्कर्म होता है। यूरोप भी दुष्कर्म के मामलों में कम नहीं है।


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ये शासन-प्रशासन व पुलिस व्यवस्था में हमसे कहीं ज्यादा आगे हैं, लेकिन वहां यह सिलसिला थम नहीं गया। प्रदर्शनों में कई ने नारे लगाए कि दुष्कर्मियों को फांसी दो, ताकि अपराधी भय खाएं। 2004 में धननंजय चटर्जी को फांसी दी गई थी। आठ साल बाद भी ऐसे अपराधियों में खौफ क्यों नहीं समाया? इसका जवाब न सरकार देगी और न ही मौजूदा कानून-व्यस्था। इसका जवाब हमें खुद अपने भीतर ढूंढ़ना है। इसके लिए हमें अपने अंदर झांक कर देखना होगा। यदि इस आंदोलन में लिए गए हमारे संकल्प इतने ही सच्चे हैं तो हम क्यों आइटम सॉन्ग इतने हिट कराते हैं। लड़कियों को बेवकूफ बनाकर पटाने वाले और उन पर फूहड़ मजाक करने वाले कॉमेडी शो सबसे ज्यादा टीआरपी क्यों बटोरते हैं? जाहिर है यह टीआरपी हमने ही दी है। यहीं से हमें खुद में बदलाव की गुंजाइशें तलाशनी होंगी। यह शुभ संकेत है कि हाल के दिनों में जनता अपने हक के लिए सड़कों पर उतरने लगी है। हालांकि इससे यह तो नहीं कहा जा सकता कि एक अच्छे समाज का निर्माण हो जाएगा, लेकिन एक बात साफ है कि जनता अब मुद्दों की बात करने लगी है।



भ्रष्टाचार, सूचना, महिलाओं की सुरक्षा, आदि के बारे में जागरूक होना दिखाता है कि अब जाति व धर्म के नाम पर राजनीति कम होगी। जनता अब नीति-निर्माताओं को उनकी जिम्मेदारी याद दिलाने लगी है। इसे खोखले वादे नहीं, ठोस कदम और परिणाम चाहिए। जहां तक आधी आबादी की सुरक्षा और बराबरी के हक पर ठोस कदमों का सवाल है तो यह मामला सिर्फ व्यवस्थागत त्रुटियों का नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक ढांचे का भी है। बेशक अपराधियों को कड़ी से कड़ी सजा के लिए सख्त कानून का होना जरूरी है, लेकिन यही पर्याप्त नहीं। कानून तो पहले भी थे, महिलाओं का दमन नहींरुक पाया। इस दमन की जड़ें इतिहास में हैं। संपूर्ण परिवर्तन के लिए बुनियादी बदलाव जरूरी है। दिल्ली की जघन्य घटना को अंजाम देने वाले दुष्कर्मी घर जाकर सो गए थे। यानी उन्हें खौफ नहीं था। पहली बात तो यह कि उनमें इतना दुस्साहस आया कहां से? जाहिर है, लचर कानून-व्यवस्था और उससे कहीं ज्यादा समाज से भय के अभाव से। इंसान पर कानून से ज्यादा समाज का डर होता है। सामाजिक दबाव के कारण ही इंसान कई बार अपने अपराध के लिए आत्महत्या तक कर लेता है।



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दुष्कर्म के तमाम मामलों में जितना सामाजिक दबाव एक पीडि़ता पर होता है, उतना यदि उसके अपराधी पर भी हो तो पीडि़ता का दर्द न सिर्फ कई गुना कम किया जा सकता है, बल्कि वह स्थिति ही बनने से रोकी जा सकती है। हम संपूर्ण परिवर्तन की उम्मीद तभी कर सकेंगे जब हम स्त्री को उपभोग की वस्तु बनाने वाले हर विज्ञापन, हर आइटम, हर चलन और हर प्रलोभन का बहिष्कार करें। मनोरंजन के नाम पर कला को प्रोत्साहन दें, फूहड़ता को नहीं। जब ऐसी फिल्में या विज्ञापन हिट नहींहोंगे तभी यह बदलाव आ सकेगा। पं. नेहरू ने कहा था किसी देश की तरक्की का पता हम उस देश की महिलाओं की स्थिति से लगा सकते हैं। आज भारत एक महाशक्ति बनने की बात करता है। ऐसे में हम कितनी प्रगति कर पाएं हैं यह राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में रहने वाली महिलाएं बता सकती हैं।



लेखिका आशिमा स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं


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