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कसौटी पर न्याय भी, समाज भी

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दिल्ली में सामूहिक दुष्कर्म की बर्बर घटना में शामिल एक आरोपी को लेकर किशोर न्याय अधिनियम यानी जुवेनाइल जस्टिस एक्ट पर नए सिरे से बहस चल रही है। जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने स्कूल सर्टिफिकेट में दर्ज उम्र के आधार पर उसे नाबालिग ठहरा दिया है, लेकिन इस फैसले पर उभरे असंतोष के बाद उच्चतम न्यायालय ने हस्तक्षेप करते हुए जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की समीक्षा करने का फैसला किया है। कुल मिलाकर इस बहस के केंद्र में जघन्य अपराधों में लिप्त किशोरों का आचरण है। इस समस्या के गंभीर सामाजिक अर्थ हैं। जुवेनाइल जस्टिस एक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट के दखल के अगले ही दिन शीर्ष अदालत ने लापता बच्चों के मामले में केंद्र और राज्य सरकारों को फटकार लगाते हुए कहा कि किसी को बच्चों की चिंता ही नहीं है।



दिल्ली की घटना में शामिल नाबालिग के संदर्भ में मीडिया की खबरों में यह सामने आया है कि सबसे अधिक दरिंदगी उसी ने दिखाई थी। इस नाबालिग आरोपी से जुड़ी गहन पूछताछ से पता चला है कि बाल तस्करी में इसे दस वर्ष की उम्र में इसके गांव से दिल्ली लाया गया। इस बीच उसके साथ कई बार मारपीट की गई। जिस याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को लताड़ा उसमें कहा गया था कि पिछले तीन साल में देशभर से करीब 55 हजार बच्चे गायब हैं। इस याचिका में इन बच्चों का पता लगाने की मांग के साथ बच्चों के अपहरण में लिप्त माफिया तत्वों को मौत की सजा देने की मांग भी की गई थी। आज ऐसे अनेक गिरोह सक्रिय हैं जो पहले बच्चों को नशे का शिकार बनाते हैं और बाद में उन्हें अपराध के दलदल में धकेल देते हैं।



आज 7-8 वर्ष की छोटी-छोटी बच्चियां भी संगठित गिरोहों की सदस्य बन रहीं हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की हालिया रिपोर्ट बताती है कि किशोरों द्वारा दुष्कर्म की घटनाएं लगभग 188 फीसद बढ़ी हैं। 2010 में यह वृद्धि मात्र 34 फीसद ही थी। चोरी-डकैती की घटनाओं में इनकी सहभागिता 200 फीसद बढ़ी है। इन अपराधों में शामिल किशोरों की उम्र 16-18 वर्ष के बीच पाई गई। इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि 2011-12 में 33 हजार से भी अधिक किशोर 25 हजार से अधिक घटनाओं में शामिल थे। उनमें से एक हजार से भी अधिक बच्चे 7-12 वर्ष के आयु समूह और 11000 किशोर 12-16 वर्ष की आयु समूह के थे तथा शेष बारह हजार से भी अधिक किशोर 16 से 18 वर्ष के आयु समूह में पाए गए। इन तथ्यों से जाहिर होता है कि नाबालिगों का अपराधों में खुलकर इस्तेमाल किया जा रहा है। आज ऐसे हजारों नाबालिग बाल सुधार गृहों में अपना जीवन काट रहे हैं। नाबालिग ने चाहे जितना जघन्य अपराध किया हो, किशोर न्याय अधिनियम की प्रक्रिया ही ऐसी है कि अपराधी बालकों के लिए सामान्य अपराधियों की तरह सुनवाई हेतु कोई कठघरा नहीं होता। इस कोर्ट में न तो वकील जिरह करते हैं और न ही उसमें सामान्य जनता उपस्थित रहती है।



इस प्रकार के बाल अपराधियों के लिए एक अलग कानून बनाने की जरूरत इसलिए पड़ी, क्योंकि जब संयुक्त राष्ट्र ने बाल अधिकारों का संयुक्त घोषणा पत्र जारी किया तो इस अंतरराष्ट्रीय कानून में 18 वर्ष के किशोर को नाबालिग घोषित किया गया था। साथ ही इसमें बच्चों की अशिक्षा, उत्पीड़न, शोषण तथा अपराध से जुड़े तमाम पहलुओं पर विचार करते हुए 18 वर्ष तक के बच्चों के मौलिक अधिकार सुनिश्चित किए गए थे। उसके बाद ही दुनिया भर की सरकारों ने बाल अधिकार से जुड़े कानून बनाए थे। अपने यहां भी इसी संधि के तहत 1992 में संसद में यह कानून पारित कर दिया गया। उसी के तहत जुवेनाइल जस्टिस एक्ट-2000 बनाया गया। पूर्व में इस अधिनियम में कई दोष थे तथा इसमें किशोर की आयु भी 16 वर्ष रखी गई थी।



2005 में कानून में संशोधन कर यह उम्र बढ़ाकर 18 कर दी गई। अब इसी उम्र को कम करने की बहस धरातल तलाश रही है। किशोर अपराधियों की उम्र में भारत सरकार यदि बदलाव करना भी चाहे तो भी उसके लिए यह आसान नहीं है। वह इसलिए, क्योंकि कई सालों की मशक्कत के बाद खुद संयुक्त राष्ट्र ने ही बाल अधिकारों का मसौदा तैयार किया था। साथ ही संयुक्त राष्ट्र में बच्चों के प्रति प्रतिबद्धता दोहराने वाले इस प्रोटोकॉल पर भारत भी अपने हस्ताक्षर कर चुका है। इसलिए यदि भारत सरकार किशोर की उम्र 18 से कम कर 16 करने का प्रयास करती भी है तो यह सीधे-सीधे उस प्रोटोकॉल का उल्लंघन होगा। इस साइबर युग में बच्चे कम उम्र में ही वयस्क हो रहे हैं। इसके लिए कानून के लचर रुख के साथ परिवार व स्कूल जैसी संस्थाओं का भी कम दोष नहीं है। निश्चित ही दिल्ली की इस घटना से अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारत की प्रतिष्ठा प्रभावित हुई है।



अब समय आ गया है कि हम अतिरेकी जज्बातों में बहने के बजाय इन किशोरों से जुड़े मुद्दों पर भी गौर करें, जो समय से पहले सोचने को मजबूर हो रहे हैं। कानूनों के साथ अब नागरिक समाज भी इस पक्ष में है कि समानांतर रूप से हमें नाबालिगों से जुडे़ कानूनों में समय के अनुरूप बदलाव करना चाहिए। सीधा-सा सवाल यह है कि यदि 15-16 या इससे अधिक उम्र के किशोर ने दुष्कर्म या हत्या जैसा अपराध किया है तो इसका मतलब यह है कि वह अपने इस कृत्य के प्रति अवगत है। इसलिए उस पर सामान्य कानूनों के अनुसार मुकदमा चलना ही चाहिए। इसी वजह से इन किशोरों की उम्र को देखने के बजाय उनके द्वारा किए जा रहे अपराधों की प्रकृति पर गौर करना समय की जरूरत है। निश्चित ही इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट का कदम सराहनीय है। अब यह केंद्र सरकार व नागरिक समाज की नैतिक जिम्मेदारी है कि वे इस मुद्दे पर शीर्ष अदालत का भरपूर सहयोग करें।



लेखक डॉ. विशेष गुप्ता समाज शास्त्र के प्राध्यापक हैं

Tag: Delhi gang rape, gang rape, sarkar, दिल्ली , सामूहिक दुष्कर्म,जुवेनाइल जस्टिस एक्ट,Juvenile Justice Act



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ruchi के द्वारा
February 10, 2013

बिलकुल सही है


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