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शोषण के तीन पहिए

Posted On: 4 Mar, 2013 में

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रिक्शा चलाने वाले को ड्राइविंग की परीक्षा पास करना जरूरी होगा। बगैर वैध लाइसेंस के रिक्शा चलाना संभव नहीं होगा। दिल्ली में दिसंबर 2007 में ऐसी कई घोषणाएं की गई थीं। यह सपना दिखाया था दिल्ली नगर निगम की स्थायी समिति ने। बीते कुछ सालों के दौरान मंदी की मार के कारण कई छोटे-बड़े कारखाने बंद हुए, बिहार-बंगाल में बाढ़ व तूफान, बुंदेलखंड में लगातार सूखे और ऐसे ही कई दुर्भाग्यों के चलते दिल्ली में प्रवासी बेरोजगारों की संख्या बढ़ी। दूसरी ओर, मेट्रो ने राजधानी के लोगों को बेहतरीन यातायात का जरिया तो उपलब्ध करवाया, लेकिन मेट्रो स्टेशन से घर की पहुंच आसान बनाने के माकूल इंतजाम नहीं किए गए। लिहाजा, हर जगह रिक्शों की मांग बढ़ी और रिक्शे वाले भी उसी अनुपात में बढ़े, लेकिन न किसी ने उनके भूखे पेट रिक्शे चलाने की मजबूरी पर ध्यान दिया और न इसकी खुली छूट ही बंद करने की कोशिश की। पांच साल बीत जाने पर भी दिल्ली नगर निगम के दावे कहीं साकार होते नहीं दिख रहे।


रिक्शा यानी ऐसा धंधा, जिसके लिए न तो किसी तरह का लाइसेंस चाहिए, न अनुमति और न ही किसी तरह के प्रशिक्षण की जरूरत। कोई जाम-पूंजी भी नहीं चाहिए और काम के घंटे भी अपने मर्जी के। सबसे बड़ी बात इन रिक्शे वालों का शोषण करना बेहद आसान है और जब देश में अरबों के घोटाले हो रहे हों तब 10-20 रुपये की घूसखेरी पर कौन ध्यान देता है। भले ही वे नौसिखिसया होने के कारण दुर्घटनाओं को न्यौता दे रहे हैं, लेकिन इसकी परवाह किसे है। दिल्ली की सड़कों पर इस समय कोई 15 लाख रिक्शे चल रहे हैं, जिनसे कोई 25 लाख लोगों का पेट जुड़ा है। लगभग बीस हजार लोगों को रिक्शों की मरम्मत से रोजगार मिला हुआ है। 40 लाख से अधिक लोग हर रोज रिक्शों की सवारी करते हैं। यदि हर सवारी औसतन 10 रुपए भी देती है तो रिक्शों पर हर रोज कम से कम चार करोड़ की पूंजी बाजार में घूमती है। भले ही नई दिल्ली और दक्षिणी दिल्ली में रिक्शों पर पूरी तरह पाबंदी हो, फिर भी राष्ट्रीय राजधानी में सार्वजनिक परिवहन में 20 प्रतिशत हिस्सेदारी रिक्शों की है। इसके अलावा सामान ढोने वाले तिपहिए साइकिल रिक्शों की संख्या भी हजारों में है। कई औद्योगिक क्षेत्रों, टेंट हाउसों, फर्नीचर और इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकानों में सामान लाने-ले जाने का आधे से अधिक काम हमारे-आपके बीच के इंसानों द्वारा खींचे जाने वाले रिक्शों से ही होता है। इतने लोगों की रोजी-रोटी, इतने लोगों की सवारी और पूरी तरह अनियोजित। न खरीदने का कोई नियम और न ही उन्हें चलाने का कोई कानून। क्या यह सब लापरवाही है या फिर सुनियोजित अपराध?


रिक्शा चलाना बेहद निरीह और गरीबी का प्रतीक दिखता है, लेकिन इसके पीछे लाखों-करोड़ों का खेल होता है। महानगर में ऐसे हजारों कारोबारी हैं, जिनके पास 500 रिक्शे हैं। एक रिक्शा पूरे दिन में दो पालियों में साठ रुपये किराया लाकर देता है। यानी तीस हजार रुपये रोज की वसूली, जबकि रिक्षा खरीदने में खर्चा हुआ, 5-10 हजार रुपये। इस तरह रिक्शे के धंधे में कई रसूखदार, नेता और पुलिसकर्मी तक लगे हुए हैं। तभी कागजों पर खूब घोषणाएं होती हैं, लेकिन उन रिक्शों को खींचने वालों के लिए किसी कानून का पालन नहीं हो पाता है। ये साइकिल रिक्शे हर रोज हजारों लीटर डीजल-पेट्रोल की बचत करते हैं। यानी पर्यावरण तो संरक्षित करते ही हैं, ईंधन खरीदने में लगने वाली बड़ी विदशी मुद्रा की भी अपरोक्ष रूप से बचत करते हैं। अफसोस कि दिल्ली के समाज का इतना महत्वपूर्ण और अभिन्न वर्ग असंगठित, उपेक्षित, अनियोजित और सरेआम शोषण का शिकार हो रहा है। कोई पांच साल पहले दिल्ली नगर निगम ने जिस लोकलुभावनी रिक्शा-नीति की घोषणा की थी, उसमें रिक्शे के धंधे से बिचौलियों को बाहर कर केवल खुद रिक्शा चलाने वालों को लाइसेंस देने, रिक्शा वालों को फोटो पहचान पत्र देने, उन्हें खींचने वालों का बीमा, रिक्शा खरीदने के लिए कर्ज और स्वास्थ्य सेवाओं के वायदे किए गए थे। उस नीति में इस बात पर जोर दिया गया था कि रिक्शों का लाइसेंस रिक्शा चलाने वाले व्यक्ति को ही दिया जाएगा, ताकि किराये पर रिक्शा चलवाने वाले रसूखदारों के शोषण से बचा जा सके। रिक्शे वालों के लिए छायादार स्टैंड बनाने की बात भी योजना में थी। आज प्रत्येक मेट्रो स्टेशन के बाहर की पूरी सड़क ही रिक्शा स्टैंड बन चुकी है। खुला आसमान ही उनकी छत है। पेड़ों की छांव जिसे मिल गई, मानो जन्नत मिल गई। निगम की योजना में यह भी कहा गया था कि पूर्व सैनिकों का एक दस्ता बनाया जाएगा, जो अवैध रूप से रिक्शा चलाने वालों को पकड़ेगा। रिक्शों के पंजीयन, उन पर इलेक्ट्रॉनिक चिप लगाने, रिक्शा-चालक को लाइसेंस जारी करने आदि कार्र्यो के लिए प्रबंधन एजेंसी की सेवा लेने की घोषणा करने वाली निगम की स्थायी समिति के प्रमुख वही नेता थे जो आज दिल्ली भाजपा के प्रधान हैं और दिल्ली नगर निगम पर आज भी उनकी ही पार्टी काबिज है। हजार से ज्यादा दिन बीत चुके हैं, लेकिन रिक्शे यथावत अवैध रूप से चल रहे हैं। स्थानीय छुटभैये नेता और रंगदार उनसे वसूली कर रहे हैं और नगर निगम के दस्तों का कमाई का जरिया बने हुए हैं। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि दिल्ली में बमुश्किल 82 हजार रिक्शों को ही लाइसेंस मिला हुआ है, जबकि सड़कों पर इसके कोई पांच गुणा रिक्शे खींचे जा रहे हैं। दिल्ली में बीते कुछ वर्र्षो के दौरान जिस तरह की चौड़ी सड़कें और फ्लाई ओवर बने हैं, जाहिर है कि वे साइकिल या इलेक्ट्रॉनिक रिक्शों के लिए नहीं बनाई गई हैं। दूसरी ओर घनी बस्तियों और कॉलोनियों के विस्तार के चलते आम लोगों से बस, मेट्रो या अन्य सार्वजनिक परिवहन के स्टैंड की दूरियां बढ़ गई हैं। इसका एकमात्र निदान रिक्शा ही है। हालांकि इसके साथ शर्त यह जुड़ी है कि सड़कों पर निजि वाहनों की भीड़ कम करने की ईमानदार मंशा हो। रिक्शा रोजगार है, यह बाजार में पूंजी ला रहा है, प्रदूषण रहित साधन है, आम आदमी की व्यय क्षमता के अनुरूप इसका किराया है। यानी यह समय की जरूरत भी है और मजबूरी भी। इस सबके बावजूद इस परिवहन व्यवस्था को नियम के दायरे में चलाने, इसको चलाने वालों को वैध मान्यता देने में हीला-हवाली करना कहां तक उचित है? रिक्शा किराये पर चलवाने को कानूनी रूप देकर एक से अधिक रिक्शे के मालिक से टैक्स वसूलने, सड़कों पर साइकिल रिक्शा जैसे धीमी गति के वाहनों के लिए अलग से सड़क-पट्टी बनाने, कुछ संकरे बाजारों में मोटर वाले वाहनों पर पूरी तरह पाबंदी लगाकर केवल रिक्शों की अनुमति देने, रिक्शों का आधुनिकीकरण करने जैसे प्रयास लाखों लोगों के जीवन में खुशियां बिखेर सकते हैं।

इस आलेख के लेखक पंकज चतुर्वेदी हैं

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