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किसानों के साथ फिर छल

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किसानों के साथ फिर छल 2013-14 के आम बजट में कृषि ऋणों में सवा लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी कर अपनी पीठ थपथपाने वाली केंद्र सरकार को सीएजी (कैग) रिपोर्ट ने जोर का झटका दिया है। संसद में पेश सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक उसने कुल खातों में से 90,576 खातों की जांच-पड़ताल की। इनमें से 20,242 खातों में गड़बड़ी पाई गई। इस हिसाब से 22.34 फीसद मामलों में अनियमितता की बात कही जा सकती है। जांच में पाया गया कि कई ऐसे किसानों की कर्ज माफी हुई जो इसके हकदार नहीं थे, जबकि कई पात्र किसानों को इसका लाभ नहीं मिला और बैंकों ने उनकी दावेदारी खारिज कर दी। कैग को दस्तावेज के साथ छेड़छाड़ और नकली दस्तावेज पेश किए जाने के भी सबूत मिले हैं।

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कर्ज माफी की उचित निगरानी न कर पाने के लिए कैग ने वित्तीय सेवाओं के विभाग को फटकार लगाई है। किसानों को संस्थागत कर्ज के बोझ से छुटकारा दिलाने के लिए सरकार ने कृषि ऋण माफी और ऋण राहत योजना 2008 लागू की थी। इसके तहत 3.69 करोड़ छोटे और 60 लाख अन्य किसानों को 52,516 करोड़ रुपये की कर्ज माफी दी गई थी। इस योजना ने संप्रग को दोबारा सत्ता में लाने में अहम भूमिका निभाई थी। भले ही कैग की ताजा रिपोर्ट ने आम चुनाव की तैयारी में जुटी कांग्रेस को असहज स्थिति में ला दिया है, लेकिन कृषि ऋणों में फर्जीवाड़े का खेल संप्रग के सत्ता में आने के बाद ही शुरू हो गया था, जब कृषि ऋणों में बढ़ोतरी के साथ ब्याज दरों में कटौती की गई। उदाहरण के लिए, 2004 में 86,000 करोड़ रुपये का कृषि ऋण आवंटित किया गया, जो 2011-12 में बढ़कर 5,75,000 करोड़ रुपये हो गया।


पिछले आठ वर्र्षो में कृषि ऋणों में न सिर्फ छह गुना से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई, बल्कि हर साल लक्ष्य की तुलना में ज्यादा कर्ज बांटे गए। 81 फीसद छोटे व सीमांत किसानों के हिस्से बमुश्किल पांच फीसद कर्ज ही आया। बाकी मलाई बड़े किसानों, व्यापारियों व उद्योगपतियों के खाते में गई। 2009-10 में दिल्ली और चंडीगढ़ को जितना कृषि ऋण (32,400 करोड़ रुपये) दिया गया वह उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और झारखंड को मिले कुल कृषि ऋणों (31,000 करोड़ रुपये) से भी ज्यादा था। यह कृषि ऋणों की परिभाषा में बदलाव लाकर किया गया, ताकि कृषि व सहायक गतिविधियों से जुड़े व्यापारियों, उद्योगपतियों, सरकारी प्रतिष्ठानों आदि को दिए गए कर्ज को भी कृषि ऋण के दायरे में लाया जा सके। इतना ही नहीं, जिन सहकारी संस्थाओं को किसानों का मित्र समझा जाता है, कुल कृषि ऋणों में उनकी हिस्सेदारी 1993-94 में 62 फीसद से घटकर 2009 में 12 फीसद रह गई। इसी प्रकार क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक पुनर्गठन के बाद मुनाफे को प्राथमिकता देने लगे। इसका नतीजा बहुसंख्यक किसानों के साहूकारों-महाजनों और सूक्ष्म ऋण संस्थाओं पर बढ़ती निर्भरता के रूप में सामने आया, जो अंतत: किसानों की आत्महत्या का कारण बना। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक 1995 से 2010 के बीच 2,90,470 किसानों ने आत्महत्या की। किसानों को नई फसल के लिए सबसे ज्यादा ऋण की जरूरत अप्रैल-मई में पड़ती है, क्योंकि मानसून से पहले उन्हें बीज से लेकर खाद तक का इंतजाम करना पड़ता है। इसलिए कायदे से वित्त वर्ष के इन दो महीनों में सबसे ज्यादा कृषि ऋण बांटे जाने चाहिए, लेकिन नाबार्ड के आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं। इसके मुताबिक अप्रैल 2009 से जनवरी 2010 के बीच कृषि क्षेत्र पर बकाया ऋण तीन लाख करोड़ रुपये था, लेकिन मार्च 2010 तक यह सीधे पांच लाख करोड़ रुपये बढ़कर आठ लाख करोड़ रुपये हो गया। फिर अगले ही महीने यह घटकर वापस तीन लाख करोड़ रुपये रह गया। खुद नाबार्ड के चेयरमैन मानते हैं कि किसानों को खरीफ सीजन के दौरान 50-60 फीसद ऋण लेना चाहिए, लेकिन न तो वितरित ऋण और न ही उनकी अदायगी के साथ फसलों के सामान्य सीजन से कोई वास्ता नजर आता है। रिजर्व बैंक के गर्वनर डी. सुब्बाराव ने स्वीकार किया है कि सब्सिडी वाला कृषि ऋण दूसरे कार्र्यो में इस्तेमाल किया जा रहा है। इसी का नतीजा है कि घोषित लक्ष्य से ज्यादा ऋण बांटे जाने के बावजूद किसानों की महाजनों पर निर्भरता कम नहीं हो रही है। 2000 से 2010 के बीच कृषि क्षेत्र को दिए जाने वाले ऋणों में 755 फीसद की वृद्धि हुई, लेकिन इस दौरान कृषि की पैदावार महज 18 फीसद बढ़ी। रिजर्व बैंक इसके लिए दो कारणों को जिम्मेदार बताता है। पहला, बैंक ऋण देने में बड़े किसानों को प्राथमिकता देते हैं, क्योंकि उनमें ज्यादा जोखिम नहीं होता। चूंकि समय से ऋण लौटाने वाले किसानों को महज 4 फीसद की दर पर कर्ज मिल जाता है, इसलिए बड़े किसान बैंकों से ऋण लेकर उसे 15-20 फीसद ब्याज दर पर छोटे किसानों को देने लगे हैं। वित्त मंत्रालय के आंकड़े भी इसकी तस्दीक करते हैं। उदाहरण के लिए 2007 में वितरित कुल कर्ज में छोटे किसानों की हिस्सेदारी महज 3.77 फीसद थी। 2010-11 में कृषि क्षेत्र को मिलने वाला कर्ज लगभग ढाई गुना बढ़कर 5,09,000 करोड़ रुपये हो गया, लेकिन इसका सिर्फ 5.71 फीसद हिस्सा ही छोटे किसानों के खाते में गया। दूसरा, बैंक एक वित्त वर्ष के आखिरी दो महीनों में कृषि ऋण का लक्ष्य पूरा करने के लिए अपने खातों में हेराफेरी से भी परहेज नहीं करते हैं। स्पष्ट है जब छोटे व सीमांत किसानों को कर्ज मिल ही नहीं रहा तो माफी का सवाल ही कहां से उठता है। ऐसे में कर्ज माफी में ही नहीं कर्ज वितरण में भी घोटाला है, जिसके आगे राष्ट्रमंडल खेल, 2जी स्पेक्ट्रम और कोलगेट जैसे घोटाले छोटे पड़ जाएंगे।

इस आलेख के लेखक रमेश दुबे हैं


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Tags: वित्त वर्ष, कृषि ऋण का लक्ष्य, किसानों के खाते, वित्त मंत्रालय



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