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जैसी नीयत वैसा नतीजा

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सरकार की नीयत पर लगातार सवाल उठे हैं। भ्रष्टाचार के आरोप भी लगातार लग रहे हैं। आरोप प्रतिपक्ष ही लगाता तो उन्हें टाला जा सकता था, लेकिन कोयला ब्लॉक आवंटन में 18,599 करोड़ के घोटाले का खुलासा नियंत्रक महालेखाकार (कैग) ने किया। 1.76 लाख करोड़ के 2जी स्पेक्ट्रम व 77,000 करोड़ के कॉमनवेल्थ का पर्दाफाश भी कैग ने किया। हेलीकॉप्टर रिश्वत कांड की पोल इटली में खुली। विपक्षी भाजपा ने अपनी जिम्मेदारी निभाई, संसद और राष्ट्र में स्वाभाविक ही उत्ताप आया। घोटाले पीछा नहीं छोड़ते। किसानों की कर्ज माफी में राजकोष की लूट का पर्दाफाश भी कैग ने ही किया है। कर्ज माफी में संप्रग की नीयत ही खोटी थी। उसने 2009 के आम चुनावों में किसानों के वोट बटोरने के लिए 52 हजार करोड़ की ऋण माफी की। 3.45 करोड़ किसानों को प्रभावित करने और उनसे वोट लाभ लेने की योजना थी, लेकिन कैग की ताजा रिपोर्ट में 20.50 करोड़ रुपये का भ्रष्टाचार पाया गया। यह आंकड़ा तब है जब सिर्फ 90,576 खातों की ही जांच हुई है।

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वित्त मंत्रालय ने कर्ज माफी को वास्तविक लाभार्थी तक पहुंचाने का कोई तंत्र नहीं बनाया। कर्ज माफी लायक किसानों की सूची भी नहीं बनाई। चुनावी लाभ के लिए ही आनन-फानन में कर्ज माफी का एलान हुआ और राजकोष लुट गया। सेवाओं को निचले स्तर तक ले जाने वाले तंत्र का अभाव सरकार की मुख्य समस्या है। राजीव गांधी ने भी कहा था कि दिल्ली से चला एक रुपया गांव तक बमुश्किल चार आना ही पहुंचता है। राहुल गांधी ने सौ में सौ पैसे पहुंचाने का वादा हाल में ही किया है। उन्होंने यह नहीं बताया कि पूरा धन लाभार्थी या उचित स्थान तक पहुंचाने के लिए वह कौन सा तंत्र इस्तेमाल करेंगे? देश की सार्वजनिक वितरण प्रणाली ध्वस्त है। राशन का 60-70 प्रतिशत गेहूं व 20-25 प्रतिशत चावल गरीबों तक पहुंचने के बजाय बाजार पहुंच जाता है। संप्रग के फैसले किसी ठोस आधार पर नहीं होते। हरेक फैसले का आधार वोट होता है। आधार कार्ड योजना का आधार भी वोट पुख्ता करना ही है। राजनीतिक दृष्टि से यह सुविचारित योजना है, लेकिन वास्तविक लाभार्थियों को लाभ पहुंचाने के लिए जरूरी तंत्र पर गौर नहीं किया गया। इसी आधार कार्ड के जरिए गरीबों को सीधे नकदी देकर नोट फॉर वोट की योजना है। कृषि कर्ज माफी योजना में बैंकों की लापरवाही और भ्रष्टाचार पर कैग की टिप्पणी ताजी है।


आपका पैसा आपके हाथ की कथित योजना के लिए कुशल प्रशासन तंत्र के साथ बैंक खातों की भी जरूरत होगी। 70 प्रतिशत आबादी के पास बैंक खाते नहीं हैं। किसानों से गेहूं और धान खरीदने में भी घपला होता है। बैंक चेक से होने वाले भुगतान के बावजूद किसानों को अपने उत्पाद का घोषित मूल्य नहीं मिलता। अधिकारी गेहूं, धान की क्वालिटी को कमजोर बताकर सस्ती दर लगाते हैं। वे बिचौलियों से खाद्यान्न खरीदते हैं और खरीद का लक्ष्य पूरा करते हैं। मूलभूत समस्या सेवा आपूर्ति के ईमानदार तंत्र की ही है। तंत्र भ्रष्ट है तो जनतंत्र ईमानदार कैसे होगा? भारत लोक कल्याणकारी राज्य है। सरकार केवल शासक ही नहीं है। तमाम कल्याणकारी काम भी उसकी जिम्मेदारी हैं। निष्ठावान प्रशासनिक तंत्र के अभाव में विकास और लोक कल्याण का धन उचित स्थान और पात्र तक नहीं जाता और राजकोष का बंदरबाट हो जाता है। समस्या पुरानी है। प्रो. एपिलबी ने भारतीय प्रशासनिक अध्ययन पर 1952 में तीन हजार शब्दों वाली रिपोर्ट दी, लेकिन उस पर गौर नहीं हुआ। भ्रष्टाचार बढ़ता गया तब 1962 में के. संथानम समिति बनी। समिति ने 1964 में रिपोर्ट दी और कहा, धारणा है कि भ्रष्टाचार के बिना कोई भी कार्य संभव नहीं। उन्होंने भ्रष्टाचार रोकने के सुझाव दिए, लेकिन लोकसेवाओं व राजकोष को निर्धारित स्थान व व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए प्रभावी तंत्र का अभाव बना रहा। सरकारें आती जाती रहती हैं। सरकारी निरंतरता के बावजूद प्रशासन ही व्यावहारिक कार्यपालिका है। लोकसेवाओं को अंतिम आदमी तक पहुंचाना प्रशासन की ही जिम्मेदारी है, लेकिन भारतीय प्रशासन संवेदनहीन है। उसका एक भाग राजनीतिक कार्यपालिका का अनुसरण करता है। हां में हां मिलाता है और राजनीतिक निर्णयों को प्रोत्साहित करता है। भ्रष्टाचार का हिस्सेदार भी बनता है। दूसरा असंतुष्ट भाग तटस्थ रहता है। गलत का प्रतिरोध नहीं करता। प्रशासनिक गुणवत्ता बढ़ाने की दृष्टि से लगभग तीन दर्जन समितियां और आयोग बने। प्राक्कलन समिति ने भी प्रशासनिक सुधार पर सुझाव दिए, लेकिन राजनीतिक कार्यपालिका अनिर्णय का शिकार रही। 5 जनवरी, 1966 को पहला प्रशासनिक सुधार आयोग बना। मोरारजी देसाई अध्यक्ष थे, वह मंत्री हो गए। आयोग ने के. हनुमंतैया की अध्यक्षता में काम किया। हनुमंतैया ने टिप्पणी की-बीते 20 वर्षो में भारतीय प्रशासन में न्यूनाधिक परिवर्तन अवश्य हुए हैं, लेकिन सुधार नहीं। आयोग ने प्रशासन व नियोजन तंत्र सहित अनेक विषयों पर 578 महत्वपूर्ण सुझाव दिए। आयोग ने प्रशासन के विरुद्ध जनशिकायतों को महत्वपूर्ण माना। सिफारिशों पर योजना आयोग का पुनर्गठन हुआ। योजना आयोग की सिफारिश पर राष्ट्रीय विकास परिषद बनी। सरकार मजबूत हो गई, प्रशासनिक सुधारों पर कोई काम नहीं हुआ। भारतीय प्रशासन को जनोन्मुखी बनाना जरूरी है। दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग (2005) की सिफारिशें भी धूल खा रही हैं। केंद्रीय बजट में काफी बढ़ोतरी हुई है। इनके कारण संस्थानिक, प्रशासनिक व वित्तीय प्रबंधन का सुदृढ़ीकरण जरूरी हो गया है। रिपोर्ट में पात्रता आधारित कार्यक्रम के लिए प्रबंधन की मजबूती पर जोर है। बीपीएल पात्रता आधारित है, खाद्यान्न वितरण, मनरेगा, आधार कार्ड, कृषि कर्ज माफी, वृद्धावस्था, महिला, विकलांग पेंशन आदि ऐसी योजनाएं पात्रता आधारित ही हैं, लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह प्रशासन को औद्योगिक घरानों की सुविधा वाला दक्षतंत्र बनाने पर आमादा हैं। यहां पात्रता की परिभाषा पर भी मतभेद हैं। प्रभावी तंत्र के अभाव में ही राजकोष की लूट है। नीयत की खोट से ही भ्रष्टाचार संस्थागत हुआ है।


इस आलेख के लेखक हृदयनारायण दीक्षित हैं


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Tags: राजनीतिक कार्यपालिका, भ्रष्टाचार, वृद्धावस्था, महिला, विकलांग पेंशन



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