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विकल्प की तलाश में देश

Posted On: 13 Mar, 2013 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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मैं ऐसी स्थिति के बारे में सोच रहा हूं जब मेरे पास गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी या कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को वोट देने के सिवा कोई और विकल्प नहीं होगा। दोनों मैदान में खड़े हैं। यह सही है कि 2014 संसदीय चुनाव में प्रधानमंत्री पद के लिए न तो भाजपा ने मोदी को अपना आधिकारिक उम्मीदवार घोषित किया है और न ही कांग्रेस ने राहुल गांधी को नामित किया है। इसके बावजूद साफ है कि दोनों पार्टियां किसके बारे में सोच रही हैं। मैं इन दोनों में किसी को प्रधानमंत्री पद के लायक नहीं मानता। वैसे वे जिस पद पर जाएंगे उसके लिए उपयुक्त हो जाएंगे, लेकिन उस पद पर बिठाने लायक वे नहीं हैं। दोनों मैदान में उतरने के संकेत के तौर पर शुरुआती भाषण दे चुके हैं।


नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में भाषण देने के साथ ही वीडियो काफ्रेंसिंग के जरिये अमेरिका में बैठे लोगों को संबोधित किया और जयपुर के कांग्रेस सम्मेलन में राहुल का भाषण पहले ही हो चुका है। इन दोनों नेताओं में कोई समानता भी नहीं है। फिर भी दोनों ने लोगों से जब नया भारत बनाने के लिए तैयार रहने का आ ान किया तो कोई संदेह बचा नहीं रहा। दोनों ने एक नए, परिवर्तित भारत का सपना दिखाया है। दोनों की तुलना यहीं पर खत्म होती है। दोनों एक-दूसरे से इतने अलग और इतने दूर हैं कि उनके आचरण या बनावट में कोई मेल नहीं है। नरेंद्र मोदी विकास के दिखावे में अपने सांप्रदायिक चेहरे को छुपा लेते हैं, जबकि 2002 के गुजरात नरसंहार से जुड़े कई मामलों में वह अब भी फंसे हुए हैं और आने वाले दिनों में भी फंसे रहने के आसार हैं। ऐसे में सर्वाेच्च कार्यपालक पद के लिए उन्हें योग्य मानना अनुचित होगा। राहुल गांधी अल्पबुद्धि वाले भोले-भाले बच्चे हैं। सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली कांग्रेस उन्हें शेर की तरह पेश कर रही है, लेकिन जब कभी उनसे कोई गंभीर सवाल किया जाता है तो उनके जवाब में गहराई नहीं होती। बजट भाषण में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी और वह बीच में ही सदन छोड़कर चले गए, जबकि आए भी देर से थे। नीतियों और इतिहास के बारे में उनकी जानकारी बहुत कम है और वह कायदे की प्रतिक्रिया नहीं दे पाते। उदाहरण के तौर पर बांग्लादेश की आजादी के संबंध में राहुल गांधी ने कह दिया कि उनके पूर्वजों ने जब कभी कुछ करने की ठान ली तो उसे पूरा करके ही दम लिया। उन्हें मालूम होना चाहिए कि पूर्वी पाकिस्तान को बांग्लादेशियों ने खुद आजाद कराया था। हां, भारत ने मदद जरूर की थी, फिर भी उसकी पूरक भूमिका ही थी।


अगले चुनाव का सबसे अहम पक्ष यह होगा कि संभवत: यह भारत का अब तक का सबसे भद्दा, विभाजनकारी और सर्वाधिक हिंसा वाला चुनाव होगा। धर्म और जाति के आधार पर देश बंटेगा। कभी समाप्त नहीं होने वाले भ्रष्टाचार के मामलों और घोटालों से जिस देश की माली हालत पहले से ही खराब है वहां चुनाव जीतने के लिए उम्मीदवार कोई भी रास्ता अपनाने से बाज नहीं आएंगे। ऐसा लगता है कि भाजपा ने तो मान लिया है कि देश ने हिंदुत्व को अपना लिया है। अगर ऐसा नहीं होता तो भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह इलाहाबाद में कुंभ मेले के दौरान आयोजित उस सभा में शामिल होने नहीं जाते, जहां संघ परिवार और अतिवादी साधुओं ने हिंदुत्व के प्रतीक राममंदिर के निर्माण की रणनीति फिर से तैयार की है। समझने वाली बात है कि संघ परिवार के समागम में विवादित ढांचे के विध्वंस को लेकर भाजपा नेताओं के खिलाफ लंबित मामलों की परवाह नहीं की गई। दूसरी ओर कांग्रेसनीत सरकार इन मामलों को जल्द निपटाना नहीं चाहती। ऐसा लगता है कि पार्टी एक ही समय में दो घोड़ों की सवारी करना चाहती है। वह पंथनिरपेक्षता को लेकर साफ-साफ नीति नहीं अपनाना चाहती, क्योंकि उसे यह भय सताता है कि अगर ऐसा किया तो हिंदू वोट छिटक जाएंगे। दूसरी ओर पार्टी यह भी मानती है कि अगर मोदी भाजपा के उम्मीदवार बनते हैं, तो उदारवादियों के पास कांग्रेस को वोट देने के सिवा कोई और विकल्प नहीं होगा। कांग्रेस और भाजपा जनमानस की मनोदशा सही-सही नहीं पढ़ पा रही हैं। आम आदमी अपने स्वभाव से पंथनिरपेक्ष है और जब वह मानता है कि चुनाव में कट्टरपंथियों को हराया जा सकता है तो फिर वह कट्टरपंथियों के साथ कभी नहीं जाएगा। ऐसा ही 2004 में भी हुआ था जब भाजपा मान रही थी कि इंडिया शाइनिंग के नारे के बूते वह फिर से सत्ता पर काबिज हो जाएगी। हकीकत यह है कि भाजपा द्वारा हिंदुत्व अपनाने का फायदा कांग्रेस को मिल सकता है, क्योंकि भारत में अपने धर्म के प्रति हिंदुओं में असुरक्षा का भाव नहीं है। अगर वे असुरक्षित महसूस कर रहे होते तो बहुत पहले ही हिंदू राष्ट्र बना लेते, क्योंकि देश की 80 प्रतिशत आबादी हिंदुओं की है। मौजूदा राजनीतिक स्थिति से साफ है कि किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिलने जा रहा। 543 सदस्यों वाली लोकसभा में साधारण बहुमत के लिए आवश्यक 273 सीटें जीतने की स्थिति में कोई पार्टी नहीं है। अगर भाजपा मोदी को अपनाती है, तो उसके सहयोगी दल छिटक जाएंगे और इन सहयोगी दलों के बगैर भाजपा सरकार नहीं बना सकती। राजग के एक प्रमुख सहयोगी जनता दल (यू) ने पहले ही साफ कर दिया है कि वह प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर मोदी को स्वीकार नहीं करेगा। ऐसे में यह विश्वास करना कठिन है कि सत्ता में वापसी को लालायित भाजपा मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाएगी। फिर भी मुझे हैरानी होती है कि हम अपनी पसंद भाजपा और कांग्रेस तक ही सीमित क्यों रखे हुए हैं? दोनों को पहले कई बार जांचा-परखा जा चुका है और देश की जनता को दोनों से ही घोर निराशा हुई है। एक ने केसरिया सोच को थोपा है तो दूसरे ने शासन के हर स्तर पर भ्रष्टाचार फैलाया है। साथ ही कांग्रेस की इमारत कभी पंथनिरपेक्षता की जिस नींव पर खड़ी थी वह नींव भी बची नहीं रही है। संभव है कि गैर कांग्रेस और गैर भाजपा गठबंधन विकल्प के तौर पर देश के सामने आए। औपचारिक तौर पर कोई तीसरा मोर्चा बनेगा या नहीं, यह अभी साफ नहीं है, लेकिन आम धारणा है कि देश को कांग्रेस या भाजपा की दया पर नहीं छोड़ा जा सकता। जब तालाब या नदी में से किसी एक में कूदना ही हो तो वोटरों के पास कोई विकल्प नहीं बचता। आखिर देश ने पुरानी गलती को दोहराना अपनी नियति क्यों मान लिया है?


इस आलेख के लेखक कुलदीप नैयर हैं

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