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राजनीति के नए संकेत

Posted On: 29 Mar, 2013 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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तीसरा मोर्चा मतलब कांग्रेस और भाजपा के अलावा बाकी राजनीतिक दलों के नेताओं की प्रधानमंत्री पद हासिल करने की महत्वाकांक्षा को जगाए रखने का मोर्चा। महत्वाकांक्षा ऐसी चीज है जो मर्यादा के दायरे में रहे तो इंसान को आसमान की बुलंदी तक ले जा सकती है और अमर्यादित हो जाए तो उसे पतन के गर्त में भी ले जा सकती है, पर वह राजनेता ही क्या जिसमें देश का सर्वोच्च प्रशासनिक पद हासिल करने की महत्वाकांक्षा न हो। मुलायम सिंह ठहरे खांटी नेता। कहते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ मनुष्य की संघर्ष करने की क्षमता घटती जाती है और समझौते करने की बढ़ने लगती है। ऐसा लगता है कि मुलायम सिंह इसी दौर से गुजर रहे हैं।

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अब लालकृष्ण आडवाणी को ही देख लीजिए। वह अभी भी प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में शामिल हैं। उन्हें शायद अपने ही बनाए हुए लोग इस महत्वाकांक्षा को हासिल करने के रास्ते की बाधा नजर आ रहे हैं। अब विचित्र स्थिति यह है कि मुलायम सिंह और आडवाणी के बीच नजदीकी बढ़ने के संकेत नजर आ रहे हैं। मुलायम सिंह यादव को लालकृष्ण आडवाणी से अपनापा इसलिए नजर आ रहा है कि दोनों एक ही किश्ती के सवार हैं। इसे इत्तोफाक कहें या और कुछ कि कुछ ऐसी ही बात अगस्त 2012 में लालकृष्ण आडवाणी ने अपने ब्लॉग पर लिखी थी। उनके मुताबिक कांग्रेस या भाजपा की बजाय तीसरे मोर्चे के किसी नेता के प्रधानमंत्री बनने की संभावना ज्यादा है। यह बात उन्होंने उस समय लिखी थी जब भाजपा का मुंबई अधिवेशन हो चुका था और नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश किए जाने की चर्चा गंभीर रूप ले चुकी थी। यह भी खबर मीडिया में खासी चर्चा का विषय बनी थी कि आडवाणी अधिवेशन के बीच में ही मुंबई से चले गए थे। उनके लिए शायद यह निराशा का दौर था। उन्हें लगा कि मेरे अलावा भाजपा से भला और कोई प्रधानमंत्री पद का दावेदार कैसे हो सकता है? मुलायम सिंह आडवाणी के इस दर्द को बखूबी समझते हैं। उन्होंने आडवाणी के मन में फिर से जोश भर दिया है। सवाल है कि मुलायम सिंह यादव ने पहले आडवाणी की प्रशंसा की, फिर तीसरे मोर्चे की संभावना का जिक्त्र क्यों किया। मुलायम बहुत चतुर राजनेता हैं। यह अलग बात है कि पिछले करीब आठ साल से उनकी राजनीति को सीबीआइ मुख्यालय से जोड़ने की कोशिश होती रही है। वह इससे खुद को अलग करने की जीतोड़ कोशिश कर रहे हैं। पहली बार कांग्रेस दबाव में आई है। 2005 से वह इस मौके का इंतजार कर रहे थे। कई बार ऐसा होता है कि आदमी किसी विशेष मकसद के लिए किसी की ओर झुकता हुआ नजर आता है। मुलायम सिंह वही कर रहे हैं। अब आडवाणी इसे प्रेम समझ लें तो इसमें मुलायम सिंह की कोई गलती नहीं है। मुलायम सिंह कांग्रेस को सिर्फ इतना बता रहे हैं कि सोच लो, तुम नहीं तो और सही। वह फिलहाल कांग्रेस से दूर नहीं जा रहे और करीब आने की कोशिश कर रहे हैं। इतना कि कांग्रेस उन्हें सीबीआइ के पाश से मुक्त कर दे। कांग्रेस भी जानती है कि एक बार मुलायम को सीबीआइ के शिकंजे से छुड़ा दिया तो वह खुद ही पिंजरे में नजर आएगी। मुलायम सिंह कुश्ती के अखाड़े के ही नहीं राजनीति के अखाड़े के भी पहलवान हैं। वह राजनीति के अखाड़े में कुश्ती के नहीं शतरंज के दांव आजमाते हैं। इसलिए वह कांग्रेस के ही भरोसे नहीं हैं। वह भूले नहीं हैं कि अयोध्या आंदोलन में आडवाणी की क्या भूमिका थी। कांग्रेस बेकार उन्हें याद दिलाने की कोशिश कर रही है। जो बात मुलायम सिंह समझ रहे हैं वह कांग्रेस को समझ में नहीं आ रही है कि देश के मुस्लिम मतदाता के निशाने पर इस समय आडवाणी नहीं नरेंद्र मोदी हैं। दरअसल, इस मसले पर आडवाणी और मुलायम दोनों एक ही पाले में हैं। दोनों ही अपना-अपना हित साधने के लिए मोदी से डरा रहे हैं। मुलायम को समझ में आ गया है कि भाजपा ने अगर मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश कर दिया तो उत्तार प्रदेश का मुस्लिम मतदाता उनका खेमा छोड़कर कांग्रेस के साथ हो लेगा। अपना मुस्लिम जनाधार बचाने के लिए मुलायम भाजपा को संदेश दे रहे हैं कि अगर वह मोदी को प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में पेश न करे तो 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद उसे नए साथी मिल सकते हैं। आडवाणी का भी सारा दांव इसी पर टिका है।


मुलायम ने नीतीश कुमार की राजनीति से सबक लिया है। नीतीश बिहार में भाजपा के साथ गठबंधन की सरकार चला रहे हैं, लेकिन मुसलमानों को भी साथ जोड़े हुए हैं। उसके लिए उन्होंने मोदी को मुद्दा बना लिया है। उन्होंने मोदी को बिहार में भाजपा का चुनाव प्रचार नहीं करने दिया। तो अगर मोदी को दूर रखने को उपलब्धि बताकर नीतीश मुसलमानों के रहनुमा बने रह सकते हैं तो मुलायम क्यों नहीं। मुलायम को आडवाणी की महत्वाकांक्षा से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन आडवाणी की महत्वाकांक्षा मुलायम के रास्ते का अवरोध हटा सकती है। मोदी दोनों के रास्ते का कांटा हैं। आज तक तीसरे मोर्चे की ऐसी कोई सरकार नहीं बनी जिसे कांग्रेस या भाजपा का समर्थन न रहा हो। तो क्या 2014 में ऐसा हो सकता है?

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तीसरे मोर्चे के पैरोकार वामपंथी दल अपने ही घाव सहला रहे हैं। 1996 में ऐसी आखिरी सरकार थी। इन 17 सालों में तीसरे मोर्चे की धुरी जनता दल खंड-खंड हो चुका है। इन टुकड़ों के नेताओं में किसी की महत्वाकांक्षा प्रधानमंत्री पद से कम नहीं है। मुलायम ही क्यों नीतीश, नवीन पटनायक, देवगौड़ा, लालूप्रसाद यादव और यहां तक कि रामविलास पासवान भी अपने को किसी से कमतर नहीं आंकते। फिर इन्हीं की बात क्यों शरद पवार, ममता बनर्जी और जयललिता का दावा कहां से कमजोर है? कौन किसको नेता मानने को तैयार होगा। 1997 में मुलायम को प्रधानमंत्री बनाने के सवाल पर लालू यादव जहर खाने को तैयार थे। फिर मान भी लें कि नेतृत्व का सवाल हल हो जाएगा तो भी तीसरे मोर्चे का सत्तारोहण तो तभी संभव है जब कांग्रेस और भाजपा को मिलाकर लोकसभा की 272 से कम सीटें हों। फिर सवाल यह है कि मुलायम सिंह तीसरे मोर्चे की बात इतने जोर-शोर से क्यों कर रहे हैं? क्या उन्हें इस जमीनी हकीकत का पता नहीं है? स्पष्ट है कि तीसरे मोर्चे की बात करके वह सबसे पहले अपने कार्यकर्ताओं को लोकसभा चुनाव के लिए तैयार कर रहे हैं, उत्साहित कर रहे हैं कि मेरे प्रधानमंत्री बनने की संभावना है बशर्ते उत्तर प्रदेश से सपा को लोकसभा की साठ सीटें मिलें। दरअसल प्रधानमंत्री पद के ये सारे दावेदार किंग बनने का दावा भले ही कर रहे हों, पर बनना किंगमेकर चाहते हैं।


इस आलेख के लेखक प्रदीप सिंह हैं


Tags: politics in India, political system of India, third front, parliament of India, शरद पवार, ममता बनर्जी, तीसरे मोर्चे, लोकसभा



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