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भारी पड़ती पुरानी भूल

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जम्मू-कश्मीर में किशनगंगा परियोजना के संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय पंचाट के हाल के फैसले पर अपने देश में बहुत कम ध्यान दिया गया-बावजूद इसके कि यह फैसला पाकिस्तान के साथ 1960 की सिंधु नदी जल संधि के तहत भारत के पहले से सीमित अधिकारों पर गंभीर दुष्प्रभाव डालने वाला है। पंचाट में यह मामला पाकिस्तान की पहल पर गया और अब जो फैसला आया है वह भविष्य में भारत की सभी परियोजनाओं पर नई तरह की बंदिशें लगाता है तथा उनकी व्यावसायिक संभावनाओं को प्रभावित करता है। यह एक बड़ी कीमत है जो भारत को लंबे समय से लंबित किशनगंगा परियोजना के संदर्भ में चुकानी होगी। इस परियोजना की रूपरेखा और आकार को 2006 में पाकिस्तान की आपत्तियों के कारण बदलना पड़ा था। सिंधु जल संधि जवाहर लाल नेहरू द्वारा की गई सबसे बड़ी गलतियों में से एक है, जिसकी कीमत भारत की एक के बाद एक पीढ़ियों को चुकानी पड़ रही है। यह आधुनिक विश्व इतिहास में साङोदारी के अनुपात और जल की मात्र, दोनों लिहाज से सबसे अधिक उदार जल साङोदारी समझौता है। समझौते के तहत सिंधु जल का 80.52 प्रतिशत भाग यानी प्रतिवर्ष 167.2 अरब क्यूबिक मीटर पानी पाकिस्तान के लिए सुरक्षित कर दिया गया है। जल बंटवारे की कोई भी संधि इतनी बड़ी दरियादिली के आसपास भी नजर नहीं आती।


एक ऐसे देश को इतनी उदारता से जल संसाधन से नवाजने का नेहरू का निर्णय किसी को भी हैरत में डालने वाला था जो अपने जन्म के समय से ही भारत के प्रति शत्रुभाव रखता रहा हो। अनंत समय के लिए इस संधि पर हस्ताक्षर करने के बजाय नई दिल्ली को एक निश्चित अवधि के समझौते पर हस्ताक्षर करने चाहिए थे ताकि वह भारत के साथ शांतिपूर्वक रहने की पाकिस्तान की गंभीरता को कसौटी पर कस सकता। इस संधि के प्रभाव में आने के पांच साल के भीतर ही पाकिस्तान ने 1965 में जम्मू-कश्मीर के एक हिस्से को हड़पने के लिए भारत पर पूरी क्षमता से हमला बोल दिया। इस युद्ध के साथ नेहरू की यह खूबसूरत ख्वाहिश हवा में उड़ गई कि भारत पानी के मामले में दरियादिली दिखाकर पाकिस्तान से शांति खरीद सकता है। इसके बाद एक के बाद एक सरकारें पाकिस्तान के व्यवहार को बदलने के लिए जल कूटनीति का सहारा लेने के कोई प्रयास न करने के कारण नेहरू की भूल के असर को बढ़ाने का ही काम करती रहीं। संधि के ताने-बाने के अनुसार भारत के पास इसकी गुंजाइश थी कि वह अपनी इस उदारता का लाभ उठाकर पाकिस्तान को इसके लिए मजबूर कर सके कि वह भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण आचरण करने से बाज आए। दुर्भाग्य से इस तरह का कोई लाभ उठाने के बजाय भारत ने इस संधि के तहत मिले कुछ महत्वपूर्ण अधिकारों का इस्तेमाल न करना ही उचित समझा। इन अधिकारों में पाकिस्तान के हिस्से में आई तीन बड़ी नदियों के 4.4 अरब क्यूबिक मीटर जल के स्थायी भंडारण की क्षमता का निर्माण करना शामिल है।


सच तो यह है कि भारत ने अपने हिस्से की तीन अपेक्षाकृत छोटी नदियों के जल के पर्याप्त भंडारण के भी इंतजाम नहीं किए। परिणाम यह है कि पाकिस्तान प्रति वर्ष भारत के हिस्से की नदियों से 11.1 अरब क्यूबिक मीटर जल बोनस के रूप में झटक लेता है। यह बोनस जल अमेरिका के साथ 1944 के समझौते के तहत मैक्सिको को मिलने वाले कुल जल का छह गुना है। चूंकि भारत में एक के बाद एक सरकारों ने इस जल के सहारे पाकिस्तान पर दबाव बनाने की कोई कोशिश नहीं की इसलिए पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान को भारत को आतंकवाद का निर्यात करने में तनिक भी नहीं सोचना पड़ा। स्थिति यह है कि पाकिस्तान आतंकियों के सहारे भारत में खून की होली खेलता है और भारत से मिलने वाले बेहिसाब पानी से अपने हाथ धोता है।


यद्यपि भारत तेजी से बढ़ते जल संकट से जूझ रहा है, लेकिन पानी के भंडारण की उसकी क्षमता निराशाजनक बनी हुई है। भारत इस मामले में केवल इथियोपिया सरीखे असफल, निर्धन और लाचार देशों से ही ऊपर है। इससे भी अधिक खराब बात यह है कि भारत ने पाकिस्तान को यह इजाजत दे दी कि वह जल समझौते का मामला अंतरराष्ट्रीय पंचाट तक ले जाए। पाकिस्तान की कोशिश भारत को चिनाब, ङोलम और मुख्य सिंधु धारा के सीमित इस्तेमाल के मिले अधिकार से वंचित करना है। वह अपनी इसी कोशिश के तहत भारत की लगभग प्रत्येक परियोजना पर आपत्ति व्यक्त कर रहा है। उदाहरण के लिए बगलिहार बिजली परियोजना पर पाकिस्तान की आपत्ति लागत को लेकर है-बावजूद इसके कि तटस्थ अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ ने जांच-पड़ताल के बाद भारत के पक्ष में फैसला सुनाया है। बगलिहार परियोजना पर मिला झटका भी पाकिस्तान को 2010 में किशनगंगा प्लांट का मामला अंतरराष्ट्रीय पंचाट में ले जाने से नहीं रोक सका।


इस मामले में अपना फैसला देते हुए सात सदस्यीय पंचाट ने किशनगंगा प्रोजेक्ट की वैधानिकता को तो स्वीकार किया, लेकिन डिजाइन के महत्वपूर्ण मुद्दे पर उसने एक तरह से पाकिस्तान का पक्ष लिया। पंचाट ने एक ऐसी शर्त जोड़ दी है जो भविष्य में शुरू होने वाली भारत की परियोजनाओं की व्यावसायिक संभावनाओं पर विपरीत असर डाल सकती है। 1980 में भारत के सलाल प्लांट की डिजाइन में पाकिस्तान की पहल पर किए गए बदलाव के मामले में ऐसा ही हुआ था। पंचाट का यह फैसला एक तरह से पाकिस्तान की जीत है और इसका नतीजा यह होगा कि सिंधु जल समझौता पहले की तुलना में और अधिक एकतरफा हो जाएगा। वास्तव में इस पंचाट के सदस्यों ने किसी विधिक शक्ति के बिना ही 2007 में अंतरराष्ट्रीय निष्पक्ष विशेषज्ञ के इस फैसले को पलटने की कोशिश की है कि अतिरिक्त जल ले जाने के लिए बनाए गए चैनल समझौते के अनुरूप ही हैं। चैनल का मामला एक तकनीकी मुद्दा है और संधि की शर्तो के अनुसार इसके बारे में फैसला निष्पक्ष विशेषज्ञ द्वारा ही किया जाना चाहिए, न कि आर्बिटेशन पैनल द्वारा। बावजूद इसके भारत की आपत्तियों को खारिज कर पंचाट के सदस्यों ने निर्थक ही एक तकनीकी मसले में घुसने की कोशिश की।


पाकिस्तान का इरादा स्पष्ट है-भारत को संधि के सीमित लाभों से भी वंचित करना। वह अपने इसी इरादे के तहत भारत की दूसरी परियोजनाओं पर भी अड़ंगे लगाना चाहता है ताकि नई दिल्ली जम्मू-कश्मीर में बिजली और पानी से संबंधित समस्याओं का समाधान न कर सके और इनके चलते स्थानीय स्तर पर असंतोष और अधिक बढ़े। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि पंचाट के सदस्य पाकिस्तान के हाथों में खेल गए। अब नई दिल्ली को सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि किसी अंतरराष्ट्रीय पंचाट को संधि की शर्तो से बाहर जाकर काम करने का अधिकार नहीं है।


इस आलेख के लेखक ब्रह्मा चेलानी हैं



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