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दोहरी ज्यादती की त्रासदी

Posted On: 22 Apr, 2013 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली दुष्कर्मो के भयावह रिकार्ड के कारण एक बार फिर केंद्र में है और यहां के लोग दोबारा आक्रोशित हैं- बर्बर दुष्कर्म और पुलिस की उदासीनता की दोहरी ज्यादती को लेकर। इस शहर के साथ-साथ देश भर को झकझोर देने वाले दिसंबर के जघन्य सामूहिक दुष्कर्म के बाद इस बार की ताजा घटना और भी ज्यादा भयावह और कष्टकारी है, यदि वास्तव में ऐसे कोई पैमाने होते भी हैं तो। हाल में सामने आई इस हृदयविदारक घटना से हर एक भारतीय को शर्मसार होना चाहिए और बेहद चिंतित भी। चिंतित इस रूप में कि आने वाली पीढ़ी और समाज के लिए हम क्या छोड़ रहे हैं।



इस बार पांच वर्ष की बच्ची के साथ दुष्कर्म हुआ। हां पांच साल की मासूम, जो पूर्वी दिल्ली में एक शादीशुदा 22 वर्षीय दरिंदे की हवस और अकल्पनीय क्रूरता की शिकार बनी। उस दरिंदे ने उसी मकान में मासूम के साथ बर्बर अपराध को अंजाम दिया जहां वह रहता था और फिर उसे मरा हुआ समझकर वहां से भाग गया। बच्ची की कमजोर पड़ चुकी चीखें करीब 40 घंटे बाद पड़ोसियों को सुनाई दीं। तब जाकर उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी हालत स्थिर बताई जा रही है। कहा जा रहा है कि वह उबर रही है। वह मासूम किससे उबर रही है? यहां आकर बच्ची पर हुआ अत्याचार अकल्पनीय बन जाता है। पुलिस रिपोर्ट में सामने आए तथ्य बच्ची के साथ हुई बर्बरता बयान करते हैं। उसके शरीर में संक्रमण हो गया। गर्दन पर मिले निशान बताते हैं कि आरोपी ने उसे गला घोंटकर मारने की कोशिश भी की।



इस निंदनीय घटना में एक छोटी सी राहत की बात यही है कि बच्ची की सांसें चल रही हैं और उसकी हालत में सुधार हो रहा है। दुष्कर्म, खास तौर पर बड़े पैमाने पर बच्चियों के साथ होते दुष्कर्म दिल्ली पुलिस की भूमिका को एक बार फिर नकारात्मक फोकस में रखते हैं। प्रारंभिक रिपोर्ट कहती हैं कि बच्ची की मां ने पुलिस को तत्काल ही उसकी गुमशुदगी की सूचना दी थी। पुलिस ने या तो मामले को गंभीरता से नहीं लिया या वह इस कदर उदासीन रही कि 40 घंटे बाद उसकी चीख सुन पड़ोसी ही बच्ची तक पहुंचे। जैसे ही यह खबर फैली आक्रोशित दिल्ली सड़कों पर उतर आई और प्रदर्शन करने लगी। स्थानीय पुलिस से जवाब मांगने लगी। जवाब में क्या मिला? एसीपी ने प्रदर्शन करने वाली एक लड़की को थप्पड़ रसीद कर दिया। इससे भी बुरा हुआ कि एसएचओ और जांच अधिकारी ने मामले को दबाने के लिए जघन्यता की शिकार बच्ची के परिवार को दो हजार रुपये की पेशकश कर डाली। यहां दो मुद्दे प्रमुखता से प्रतिबिंबित होते हैं। एक तो देश में दिन-प्रतिदिन बढ़ते दुष्कर्म और उनमें भी सभी का सामने न आ पाना। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक 1971 से 2011 के बीच 40 वर्षो के दौरान पुलिस में दर्ज दुष्कर्म के मामले 873 फीसद बढ़े हैं। यह संख्या 1971 में 2,487 से 2011 तक बढ़कर 24,206 हो गई। दूसरी तरफ हत्या के मामले 250 फीसद बढ़े हैं।



इन आंकड़ों के मद्देनजर अनुमान लगाया गया है कि देश में हर तीन दुष्कर्मो में से एक की शिकार बच्ची होती है। बच्चों के खिलाफ 2011 में हुए अपराधों की संख्या 30,000 से भी ज्यादा थी। संक्षिप्त में कहें तो बच्चों, खास तौर पर बच्चियों का लालन-पालन खुशनुमा और सुरक्षित माहौल से दूर है। उनको अगवा कर भीख मंगवाने या वेश्यावृत्ति में धकेल दिए जाने से ज्यादा खतरा यौन हिंसा की शिकार बनने का है। दूसरा मुद्दा वह है जिसके कारण जनता उबाल पर है-दिल्ली पुलिस का रवैया, जिसने पिछले दिसंबर में भी इंडिया गेट सहित तमाम दूसरी जगहों पर उमड़े प्रदर्शनकारियों से निपटने में ऐसी ही निष्ठुरता और सहानुभूति के अभाव का प्रदर्शन किया था। महिला को थप्पड़ मारने वाले एसीपी का वह आक्रामक रवैया और किसी एफआइआर पर काम करने का तरीका दिल्ली पुलिस में भीतर तक पैठ कर चुके रुख की ओर संकेत करते हैं। जनता के लिए इसका नारा जरूर ‘आपके साथ और आपके लिए’ है, मगर दिल्ली के औसत नागरिक का दिल्ली पुलिस पर कोई भरोसा नहीं रह गया है।


लोगों पर झूठे आरोप मढ़ना और थानों में उनकी पिटाई करना दिल्ली पुलिस के लिए रोजमर्रा की बात हो चुकी है और ऐसी ताकतें जिनके कारण ये हालात बने हैं, अब बहुत मजबूत हो चुकी हैं। बीते दिसंबर में आंदोलित जनता के आक्रोश ने सरकार, राजनीतिक दलों और स्थानीय पुलिस को सक्रिय तो किया, लेकिन मौजूदा हालात में देखा जा सकता है कि जमीनी हकीकत में कुछ ही बदलाव आ पाया है। इन दोनों मुद्दों- सामाजिक रुख और दिल्ली पुलिस के रवैये पर गहराई से और संपूर्णता में विचार किए जाने एवं दृढ़ निश्चय के साथ नीतिगत बदलाव करने की जरूरत है। वह सामाजिक रुख भी बदलना होगा जो भारत में आम तौर पर व्याप्त है और जिसके परिणामस्वरूप ऐसी बर्बर घटनाएं रोजाना सामने आती रहती हैं। अगर समाज के स्तर पर इसके खिलाफ पहल नहीं हुई तो कुछ विशेष हासिल होने वाला नहीं है।


जब पूरे मीडिया का ध्यान पांच वर्ष की बच्ची के मामले पर केंद्रित है, पिछले 24 घंटों के दौरान ऐसी ही जघन्यता को 13 साल की एक बच्ची के साथ उसी के भाई के सामने अंजाम दिया गया। आखिर कोई आदमी ऐसा विकृत व्यवहार क्यों करता है? यह व्यवहार अपवाद नहीं है। भारतीय समाज को अपने भीतर गहरे झांकना होगा, यह पता लगाने के लिए कि ऐसी विकृत यौन मानसिकता क्यों आम होती जा रही है? स्पष्ट है कि परिवार, मोहल्ले, स्कूल और समाज से मूल्य खत्म होते जा रहे हैं। उनकी जगह ऐसे विकृत विचार ले रहे हैं जो महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देते हैं। भारतीय समाज में मूल्यों के इस निर्वात का सामना करने की जरूरत है। इससे भी ज्यादा सचेत रहने की जरूरत तब होगी जब दुष्कर्म की ऐसी घटनाएं बड़े पैमाने पर आक्रोश पैदा करना बंद कर दें और बदलाव की मांग न हो। इसके साथ ही पुलिस सुधार दूसरी सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं। दिल्ली पुलिस को अपनी गलतियों को नियंत्रित करने और उसके मौजूदा रुख-रवैये में रचनात्मक बदलाव किए जाने की जरूरत है। तब तक दिल्ली में हर एक लड़की की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजधानी की यह जमीनी हकीकत एक शर्मनाक कलंक है।


इस आलेख के लेखक सी. उदयभाष्कर हैं


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