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भरोसा बढ़ाने वाली भेंट

Posted On: 22 May, 2013 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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चीन के प्रधानमंत्री ली कछ्यांग की भारत यात्र ने दोनों देशों के साथ-साथ दुनिया का ध्यान भी खींचा।इसलिएऔर भी अधिक, क्योंकि उनकी यह यात्र लद्दाख में चीनी सैनिकों की घुसपैठ और इसके चलते द्विपक्षीय रिश्तों में आए ठहराव की पृष्ठभूमि में हुई।ली कछ्यांग नई दिल्ली में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ मुलाकात के बाद मुंबई गए।भले ही दोनों देशसीमा विवाद के बेहद जटिल मुद्दे के समाधान की दिशा में बहुत आगे तक न जा सके हों, लेकिन यह ध्यान देने लायक है कि खुद ली ने अपनी इस यात्र को द्विपक्षीय रिश्तों के लिए बेहद महत्वपूर्ण बताया और अनेक क्षेत्रों में परस्पर सहयोग का अपने स्तर पर संकल्प भी व्यक्त किया।सीमा विवाद जैसे मुद्दों का रातोंरात समाधान होता भी नहीं है।फिर भी इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि चीन ने अपनी ओर से पर्याप्त संकेत दिएकि वह भारत के साथ मजबूत संबंधों का पक्षधर है।इसका संकेत इससेभी मिलता है कि मनमोहन सिंह और ली कछ्यांग की मुलाकात के बाद दोनों देशों ने विभिन्न क्षेत्रों में आपसी सहयोग के आठ समझौतों पर हस्ताक्षर किए।यहअनायास नहीं है कि ली कछ्यांग ने अपनी भारत यात्र को अत्यधिक महत्व दिया और यह कहने में भी हिचक नहीं दिखाई कि वह नई दिल्ली में अपने घर जैसा अनुभव कर रहे हैं।यह इसका स्पष्ट संकेत है कि चीन नई दिल्ली से किस तरह की अपेक्षाएं कर रहा है? चीन के साथ संबंधों के मामले में अविश्वास की पूरी गुंजाइश है, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि ली कछ्यांग ने अपेक्षाओं से अधिक निकटता प्रदर्शित की।


ली की भारत यात्र का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि उन्होंने तब भारत आने का फैसला किया जब प्रोटोकाल के अनुसार बारी मनमोहन सिंह के बीजिंग जाने की थी। यह माना जाता है कि ली ने खुद इस पर जोर दिया कि वह प्रधानमंत्री के रूप में अपनी पहली विदेश यात्र में भारत जाना चाहते हैं। अपने इस फैसले के कारण उन्होंने यह संदेश दिया कि वह भारत को एक महत्वपूर्ण सहयोगी देश के रूप में देखते हैं। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है कि उन्होंने अपने विदेश नीति प्रतिष्ठान की इन आपत्तियों को खारिज कर दिया कि नई दिल्ली में गर्मी का मौसम उनकी आधिकारिक भारत यात्र के लिए ठीक नहीं है और भारत सरकार अपने कार्यकाल के अंतिम वर्ष में गंभीर राजनीतिक समस्याओं का सामना कर रही है। स्पष्ट है कि ली की भारत यात्र का संदेश कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। कोई भी यह सवाल उठा सकता है कि जब चीन के प्रधानमंत्री अपनी भारत यात्र को इतना महत्वपूर्ण मान रहे थे तो लद्दाख में चीनी घुसपैठ की घटना क्यों हुई?


इस घटना का कारण जो भी हो, यह समझा जाना चाहिए कि यह सरकारों का काम है कि वे किसी देश के साथ संबंधों के मामले में कई स्तरों पर संपर्क कायम करने के प्रयास करें और अगर वह देश पड़ोसी है तो दोनों देशों के बीच हितों का टकराव अवश्यंभावी हो जाता है। चीन और भारत का मामला ऐसा ही है। लेकिन यह तथ्य कि वे आपस में पड़ोसी हैं इस जरूरत को भी रेखांकित करता है कि उन्हें सहयोग के रास्ते तलाशने ही होंगे और शांति कायम रखनी होगी। लद्दाख में जो कुछ हुआ वह भारत के साथ निपटने की चीन की एक रणनीति थी और नई दिल्ली के साथ आर्थिक सहयोग की इच्छा व्यक्त करना बीजिंग की अलग नीति है। दोनों को अलग-अलग रूप में देखने की जरूरत है। सच तो यह है कि भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने खुद यह कहा है कि जहां तक चीन और भारत के संबंधों का प्रश्न है तो दोनों देशों के बीच सहयोग और प्रतिस्पर्धा, दोनों संभव है। यह एक नई सच्चाई है जो भारत सरकार और यहां के लोगों को स्वीकार करनी होगी। जब तक दोनों देशों के बीच सीमा विवाद लंबित है तब तक भारत को घुसपैठ की घटनाओं के लिए तैयार रहना चाहिए। ऐसी घटनाओं के चलते लंबी अवधि के गतिरोध भी पैदा हो सकते हैं। लद्दाख में यही देखने को मिला।


यह अच्छी बात है कि दोनों देश आर्थिक संबंधों में और अधिक निकटता लाने का संकल्प व्यक्त कर रहे हैं। इस मामले में यह भी उल्लेखनीय है कि व्यापार घाटे के सिलसिले में चीन ने भारत की चिंताओं को समझा। व्यापार घाटे पर भारत की चिंताएं जायज हैं, लेकिन इस चिंता का समाधान तभी हो सकता है जब भारत और अधिक चीनी निवेश के लिए आगे आए। खासकर बुनियादी ढांचे और उत्पादन के क्षेत्रों में चीनी निवेश बढ़ाने की अच्छी-खासी संभावनाएं मौजूद हैं। भारत के लिए फिलहाल मुक्त व्यापार समझौते के चीन के प्रस्ताव को स्वीकार करना जल्दबाजी हो सकती है, लेकिन कुछ अन्य आर्थिक सहयोग के क्षेत्रों पर तत्काल प्रभाव से ध्यान दिया जा सकता है। यह गौर करने लायक है कि चीन ने दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कोरिडोर पर निगाह डाली है जिसे जापान के सहयोग से पूरा किया जा रहा है। चीन के प्रधानमंत्री की भारत यात्र में अनेक सकारात्मक संकेत छिपे हैं। अब दोनों देशों को व्यापक राजनीतिक और आर्थिक संपर्को के साथ-साथ व्यक्ति के व्यक्ति से संपर्क को विकसित करने पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। छात्रों, बुद्धिजीवियों, वैज्ञानिकों, पत्रकारों और जूनियर तथा मध्यम स्तर के नौकरशाहों के एक-दूसरे के देशों में आने-जाने पर नए सिरे से ध्यान देने की आवश्यकता है। इससे दोनों देशों की जनता के बीच अविश्वास की जो भावना कायम है उसे दूर करने में मदद मिलेगी।


इस आलेख के लेखक जबिन टी. जैकब हैं


Tags: India And China Relations, China Politics, China Politics 2013, China Prime Minister, India And China Trade, India And China War, Global Economic Crisis, India And China, Li Keqiang, चीन और भारत, वैश्विक अर्थव्यवस्था, चीन राजनीति, भारत और चीन राजनीति , भारत-चीन संबंध , ली कछयांग



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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ऋषभ शुक्ला के द्वारा
May 22, 2013

सुन्दर लेख, आज मै एक ऐसी रचना लेकर आप सब के सामने उपस्थित हुआ हूँ, जिसे पढ़कर आप सब की आँखे नाम हो जायेगी. और यही हमारे देश की कड़वी सच्चाई भी है, इस कविता के माध्यम से मै ऋषभ शुक्ला, इस समाज का निर्दयी ही सही लेकिन है तो सच. आज हमारे समाज के लोग महिलाओ के प्रती वही पुरानी सोच रखते है जो वह हमेशा रखते आये है, और आगे भी ऐसी ही सोच रखने का इरादा है. गरीब माँ-बाप अपनी बेटियों को बोझ समझते है और वह संतान के रूप में एक बेटा चाहते है, और इसके लिए वह गर्भ में ही जाच के द्वारा उन्हें यदी पता चल गया की गर्भ में बच्ची है तो उसे इस दुनिया में आने से पहले ही मार देते है, उस नन्ही सी जान को जो इस निर्मम दुनिया में आने को बेताब रहती है, उसकी सभी इच्छाओ को भी मार देते है . मै इस कविता के माध्यम से उस छोटी गुडिया के दर्द को आप सब से मुखातिब करने का प्रयत्न कर रहा हूँ. कृपया मेरी गुजारिश है की आप सब इस लिंक को देखे और उसके बारे में कम से कम दो शब्द कहे. यदी कमेंट देने में कोई असुविधा हो तो उसे लाइक करे या वोट करे. http://rushabhshukla.jagranjunction.com/?p=25 शुक्रिया


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