blogid : 5736 postid : 7041

विकास की विभीषिका

Posted On: 25 Jun, 2013 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

हाल में उत्तराखंड में आई विभीषिका का प्रत्यक्ष कारण ग्लोबल वार्मिग दिखता है। धरती का तापमान बढ़ने से बरसात तेज और कम समय में हो रही है। भीषण बरसात और सूखे के दौरे पड़ रहे हैं। वायुमंडल की विशेष परिस्थिति में बादल फटते हैं। सामान्य परिस्थिति में हवा पानी की बूंदों को लेकर ऊपर उठती रहती है। छोटी बूंदें बड़ी होती जाती हैं। तापमान कम होता है तो ये बूंदें बर्फ बन जाती हैं और ओले का रूप धारण कर लेती हैं। विशेष परिस्थितियों में हवा ऊपर नहीं उठ पाती है, परंतु पानी की बूंदें बड़ी होती जाती हैं। ये बड़ी बूंदें एकदम से गिर पड़ती हैं, जिसे बादल फटना कहा जाता है। 1गिरने वाले इस पानी को यदि पहाड़ सहन कर लेता है तो विशेष नुकसान नहीं होता है। पहाड़ कमजोर हो तो वही पानी विभीषिका का रूप धारण कर लेता है। बड़ी मात्र में पेड़ लगे हों तो पानी उनकी जड़ों के सहारे पहाड़ के अंदर तालाबों में समा जाता है, जिन्हें एक्वीफर कहते हैं। पेड़ कमजोर हों तो वही पानी सीधी धारा बनाकर नीचे गिरता है और अपने साथ पेड़ों और पत्थरों को लाकर नदी में डाल देता है। तब उफनती नदी अपने साथ पेड़ों और पत्थरों को लेकर बहती है। इनकी टक्कर से मकान और पुल ध्वस्त हो जाते हैं, जैसा कि हाल में हुआ है। 1केदारनाथ के नीचे फाटा व्यूंग और सिंगोली भटवारी जल विद्युत परियोजनाएं बनाई जा रही हैं। इनमें लगभग 30 किलोमीटर की सुरंग खोदी जा रही है। भारी मात्र में डायनामाइट का प्रयोग किया जा रहा है। इन विस्फोटों से पहाड़ के एक्वीफर फूट रहे हैं और जमा पानी रिस कर सुरंग के रास्ते निकल रहा है।

संकटों का उजाला


पहाड़ के जल स्नोत सूख रहे हैं। पेड़ों को पानी नहीं मिल रहा है और वे कमजोर हो रहे हैं। धमाकों से पहाड़ कमजोर और जर्जर हो रहे हैं। फलस्वरूप पानी बरसने से चट्टानें धसक रही हैं तथा पत्थर नीचे आ रहे हैं। मैने सूचना के अधिकार के अंतर्गत डाइरेक्टर जनरल आफ माइन सेफ्टी से पूछा कि विस्फोट की मात्र के निर्धारण संबंधी फाइल मुङो उपलब्ध कराई जाए। उत्तर दिया गया कि फाइल गुम हो गई है। इससे ज्ञात होता है कि कंपनियां विस्फोटों पर परदा डालना चाहती हैं। वर्तमान विभीषिका में श्रीनगर परियोजना का विशेष योगदान रहा है। कंपनी ने भारी मात्र में मिट्टी को नदी के किनारे डाल दिया था। जलस्तर बढ़ने पर यह मिट्टी नदी के साथ बहकर घरों में घुस गई और राष्ट्रीय राजमार्ग पर जमा हो गई। राजमार्ग सात दिनों से बंद है। 1सारांश है कि बादल फटना सामान्य बात है, परंतु गिरे पानी को ग्रहण करने की धरती की शक्ति को हमने जलविद्युत परियोजनाओं को बनाने के लिए किए जा रहे विस्फोटों से कमजोर बना दिया है। ऐसा ही प्रभाव सड़कों को बनाने के लिए किए गए विस्फोटों और गैरकानूनी खनन का होता है। नदी के पाट पर किए जा रहे अतिक्रमण से व्यक्ति अपने को बाढ़ के मुंह में डालता है। 1जल विद्युत परियोजनाओं से उत्पन्न बिजली का लाभ शहरी उपभोक्ताओं को होता है। उत्तराखंड के पास अपनी जरूरत भर बिजली उपलब्ध है, लेकिन राजस्व कमाने के लिए राज्य सरकार प्रत्येक नदी के प्रत्येक इंच के बहाव पर जल विद्युत परियोजना बनाने का प्रयास कर रही है। इन परियोजनाओं से राज्य को 12 प्रतिशत बिजली फ्री मिलती है। इसे बेचकर सरकार राजस्व कमाती है। इस राजस्व में आधा सरकारी कर्मियों के वेतन को जाता है। शेष में बड़ा हिस्सा अन्य प्रशासनिक खर्चो में जाता है, जैसे गाड़ी इत्यादि में। बची रकम विकास कार्यो में खर्च की जाती है। इसमें 20 से 50 प्रतिशत घूस में जाता है। आम आदमी को राजस्व का केवल 20-25 प्रतिशत ही मिलता है, लेकिन परियोजना के 100 प्रतिशत दुष्परिणाम को आम आदमी ङोलता है। उसकी बालू-मछली से होने वाली आय बंद हो जाती है। परियोजना में उत्पन्न मच्छरों से आम अदमी की मृत्यु होती है। विस्फोटों से आई विभीषिका का ठीकरा भी आम आदमी के सिर ही फूटता है। 1इसी प्रकार का प्रभाव दूसरे विकास कार्यो का होता है। अंधाधुंध खनन से लाभ खनन माफिया को होता है।

नाकाम देश की धोखाधड़ी


खनिज का उपयोग मुख्य रूप से अमीरों की इमारतें बनाने के लिए किया जाता है। सरकार को अवैध खनन से राजस्व कम और सरकारी कर्मियों को घूस ज्यादा मिलती है। नदी के पाट में अतिक्रमण का प्रभाव भी ऐसा ही है। अतिक्रमण प्रभावी वर्ग ही करता है। अमीर को सस्ती भूमि हासिल हो जाती है। सरकार को रजिस्ट्रेशन शुल्क नहीं मिलता है। हां घूस भरपूर मिलती है। इनके कार्यो के विपरीत सड़क निर्माण का आम आदमी पर सुप्रभाव पड़ता है। उसके लिए आवागमन सुगम हो जाता है। कॉलेज, अस्पताल और सॉफ्टवेयर पार्क बनाने का आधार बनता है। इनसे दीर्घकालीन और उच्चकोटि के रोजगार स्थापित होते हैं, जैसे लेक्चरर या साइंटिस्ट के। 1समग्र दृष्टि से देखने पर विभीषिका के कारणों में मात्र सड़क बनाना ही लाभप्रद दिखता है। सड़क निर्माण से आपदा में वृद्धि न हो, इसके लिए डायनामाइट का उपयोग अपरिहार्य स्थिति में ही किया जाए। छेनी और सब्बल से ही पहाड़ काटना चाहिए। हां इससे निर्माण कार्य धीमी गति से होगा, पर पहाड़ जर्जर होने से बच जाएंगे। 1अवैध खनन, अतिक्रमण और जल विद्युत परियोजनाएं इस विभीषिका के कारण हैं। इन परियोजनाओं में घूस वसूलने के पर्याप्त अवसर उपलब्ध हैं। जानकार बताते हैं कि जल विद्युत परियोजनाओं का अनुबंध दस्तखत करने का मंत्रीगण एक करोड़ रुपये प्रति मेगावाट की घूस लेते हैं। उत्तराखण्ड में 40,000 मेगावाट कीसंभावना को देखते हुए घूस की इस विशाल राशि का अनुमान लगाया जा सकता है। इन कार्यो के माध्यम से राज्य सरकार गरीब पर आपदा डालकर अमीर को लाभ पहुंचा रही है और इस पाप में अपना हिस्सा बटोर रही है

इस आलेख के लेखक भरत झुनझुनवाला हैं


आजादी से दूर सीबीआइ

अपने ही जाल में फंसी कांग्रेस



Tags:               

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

0 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments


topic of the week



latest from jagran