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Indian Judicial System: न्याय पर गंभीर सवाल

Posted On: 6 Sep, 2013 में

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गत दिसंबर में दिल्ली में सामूहिक दुष्कर्म की घटना ने देश को झकझोर कर रख दिया था। पिछले दिनों इस मामले में जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड का फैसला आया है। इसमें नाबालिग को सामूहिक दुष्कर्म और हत्या के मामले में दोषी करार देते हुए तीन साल की सजा सुनाई गई है। इस जघन्य वारदात के बाद से ही नाबालिगों की उम्र और अपराध की प्रकृति को लेकर बहस छिड़ी हुई है। जेजे बोर्ड के इस फैसले को पीड़िता की मां ने पूरी तरह खारिज कर दिया है। इस बर्बरता की इतनी कम सजा मिलने से लोग आहत हैं। उनका कहना है कि नाबालिग को इस गुनाह की सजा फांसी से कम नहीं होनी चाहिए। सामूहिक दुष्कर्म में शामिल इस नाबालिग की उम्र व उसके द्वारा किए गए अपराध व उसकी सजा को किशोर न्याय अधिनियम (बालकों की देखरेख और संरक्षण)-2000 तथा नियम-2007 के संदर्भ में समझने की आवश्यकता है। इस एक्ट में 18 वर्ष से कम उम्र वालों को किशोर माना गया है।

इसके तहत नाबालिग द्वारा किए गए जघन्यतम अपराध के लिए अधिकतम सजा तीन साल ही है। यह सवाल विचारणीय है कि इतने क्रूर अपराध की सजा केवल तीन साल ही क्यों है? 1मुश्किल यह है कि नाबालिगों द्वारा किए जाने वाले अपराध बाल अधिकार और संरक्षण कानून से बंधे हैं। दसअसल, इस प्रकार के नाबालिग अपराधियों के लिए एक अलग कानून बनाने की जरूरत इसलिए पड़ी, क्यांेकि संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी बाल अधिकारों के संयुक्त घोषणापत्र के तहत अंतरराष्ट्रीय कानून में 18 वर्ष के किशोर को नाबालिग घोषित किया गया। साथ ही इसमें बच्चों की अशिक्षा, उत्पीड़न, शोषण तथा अपराध से जुड़े तमाम पहलूओं पर विचार करते हुए 18 वर्ष तक के बच्चांे के मौलिक अधिकार सुनिश्चित किए गए थे। तत्पश्चात ही दुनिया भर की सरकारों ने अपने-अपने देशों में बाल अधिकार से जुड़े कानून प्रतिपादित किए। भारत में भी इसी संधि के तहत 1992 में संसद में यह कानून पारित कर दिया गया। उसी के अनुपालन में जेजे एक्ट-2000 बनाया गया। पूर्व में इस अधिनियम में कई दोष थे तथा इसमें किशोर की आयु भी 16 वर्ष रखी गई थी। बाद में 2005 में इस कानून में संशोधन करके यह उम्र बढ़ाकर 18 कर दी गई। अब इसी उम्र को कम करने को लेकर यह बहस एक बार फिर सतह पर आ गई है। मगर ध्यान रहे किशोरवय की उम्र 18 से कम करना अकेले सरकार के वश की बात नहीं है। संयुक्त राष्ट्र में बच्चों के प्रति प्रतिबद्धता दोहराने वाले बाल अधिकारों के कन्वेंशन, बीजिंग रूल्स तथा रियाद गाइडलाइंस जैसे तीन अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर भारत ने भी अपने हस्ताक्षर किए हैं। 1नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की हालिया रिपोर्ट बताती है कि नाबालिग किशोरों द्वारा अंजाम दी गई दुष्कर्म की घटनाओं में 188 फीसद की वृद्धि हुई है।

2010 में यह वृद्धि मात्र 34 फीसद ही थी। लचर आपराधिक न्याय प्रणाली के चलते आज संगठित अपराध एक उद्योग का रूप ले चुका है। पिछले दिनों देश की शीर्ष अदालत में एक जनहित याचिका दायर की गई थी, जिसमें कहा गया था कि पिछले तीन साल में देशभर से करीब 55 हजार बच्चे गायब हुए हैं। इस याचिका में न केवल इन बच्चों का पता लगाने की मांग की गई थी, बल्कि बच्चों के अपहरण में संलिप्त माफिया तत्वों को मौत की सजा जैसे कठोर दंड देने की मांग भी की गई थी। देखने में आया है वयस्क अपराधी ऐसे ही बच्चों का प्रयोग गंभीर अपराधों में करते हैं। आज ऐसे अनेक गिरोह सक्रिय हैं जो पहले बच्चों का अपहरण करते हैं, उन्हें नशे की लत डालते हैं तथा बाद में अपराध करने को मजबूर करते हैं। सजा पाए इस नाबालिग से जुड़ी गहन काउंसिलिंग से ज्ञात हुआ है कि वह दस साल की उम्र में एक दलाल के द्वारा दिल्ली लाया गया तथा वहां अलग-अलग चाय के ढाबों पर बाल श्रमिक के रूप में कार्य करता रहा। इस बीच उसके साथ कई बार मारपीट भी होती रही। उसे मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों के साथ भी रहना पड़ा। उसी का नतीजा है कि आज उसने कम उम्र में ही इतनी जघन्य घटना को अंजाम दिया। ऐसे ही हजारों नाबालिग आज इन बाल सुधार गृहों में अपना जीवन काट रहें है, परंतु किशोर सुधार के नाम पर इन गृहों में बाल सुधार नदारद है।

इसमें संदेह नहीं कि इस साइबर दुनिया में बच्चे अब छोटी उम्र में ही जवान हो रहे हैं। बच्चों को अपराधों की तरफ मोड़ने में परिवार व स्कूल जैसी संस्थाओं का दोष भी कम नहीं है। साथ ही इसके लिए राजनीतिक व संसदीय संस्थाएं भी जिम्मेदार हैं। निश्चित ही महिलाओं के प्रति लगातार बढ़ती यौन उत्पीड़न की इन घटनाओं से उपजा आक्रोश वर्तमान कानूनों और राजनीति पर सीधे सवाल खड़े कर रहा है, परंतु जज्बातों में बहकर मुद्दा यहां किसी किशोर की आयु घटाने-बढ़ाने का नहीं होना चाहिए। समाज व देश इस सच्चाई से वाकिफ है कि जेजे 2000 में नाबालिगों की उम्र में आसानी से संशोधन नहीं किया जा सकता, परंतु किशोर न्याय कानून में इतना परिवर्तन तो किया जा सकता है कि यदि 16 साल से अधिक आयु का बालक दुष्कर्म और हत्या के आरोप में पकड़ा जाता हैं तो उस पर सामान्य कानूनों के मुताबिक ही मुकदमा चलाया जाएगा। ऐसा नहीं है कि नाबालिगों द्वारा किए जाने वाले अपराधों की गंभीरता केवल भारत में ही है। अमेरिका, इंग्लैंड, हॉलैंड, सऊदी अरब, पाकिस्तान व नाइजीरिया तक में नाबालिग अपराधियों के लिए अपराध की गंभीरता के आधार पर मृत्युदंड तक का प्रावधान है। नाबालिगों से जुड़े जघन्य अपराधों के सही कारणों की खोज करने के साथ-साथ इनसे जुड़े कानूनों में भी समय और परिस्थितियों के अनुसार बदलाव होना ही चाहिए।


इस आलेख का लेखक डां विशेष गुप्ता हैं


Web Title: indian judicial system



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