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मतिभ्रम की शिकार भाजपा

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भाजपा मतिभ्रम की शिकार हो गई है। अनिर्णय में निर्णय की तलाश कर रही है। गोवा कार्यकारिणी के बाद से पार्टी में जो भितरघात शुरू हुई थी वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तमाम प्रयासों के बावजूद थमने का नाम नहीं ले रही है। भाजपा नेतृत्व जितने पैबंद लगाने की कोशिश कर रहा है उससे तेज गति से उसकी साख तार-तार हो रही है। पार्टी के कुछ नेता अपनी महत्वाकांक्षाओं के लिए पार्टी का चीरहरण करने में लगे हैं। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह चाहे लाख प्रयास कर रहे हों कि पार्टी के सभी लोग संतुष्ट हों, लेकिन अब यह स्वप्न देखना बंद कर देना चाहिए। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अब खुद लालकृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज को समझाने की कमान संभाल ली है। यह एक सच्चाई है कि पानी रुका पड़ा हो तो उसमें सड़ांध आने लगती है। ऐसा नहीं कि भाजपा नेतृत्व को इसका अहसास नहीं हो। पार्टी के एक बड़े नेता का कहना है कि डिबेट और डिले (बहस और देरी) पार्टी को नुकसान पहुंचा रही है। यानी वह मानते हैं कि पानी के प्रवाह को रोककर रखना पार्टी के लिए घातक है। कुछ स्तर पर प्रवाह को सुचारु करने की कोशिश भी हो रही है, लेकिन बात सिर्फ कोशिश की नहीं, बल्कि फैसले की है। गोवा में एक फैसला हुआ था, नरेंद्र मोदी को चुनाव अभियान समिति की कमान सौंप दी गई। दरअसल पार्टी को लगा था कि 1999 में 182 से लगातार घटते हुए अब जिस 116 के पायदान पर खड़े हैं वहां से मोदी का चेहरा ही पार्टी की सूरत बदल सकता है। तीन महीने गुजर चुके हैं और पार्टी अभी भी गोवा में ही खड़ी है, बल्कि कुछ मामलों में अंदरूनी संघर्ष ने और पीछे धकेल दिया है। भाजपा में प्रधानमंत्री चेहरा तय करके चुनाव लड़ने की परंपरा रही है। अटल बिहारी वाजपेयी के बाद 2009 में लालकृष्ण आडवाणी चुनावी चेहरा थे।

मोदी के असर की बानगी


शायद यही कारण है कि कार्यकर्ताओं को नेतृत्व ने मिशन-2014 के लिए कमर कसने का आह्वान किया तो दूसरी ओर से नेता का चेहरा बताने की मांग तेज हो गई। अभी पिछले महीने पार्टी की बिहार इकाई ने जल्द से जल्द प्रधानमंत्री पद के दावेदार का नाम तय करने के लिए एकमत प्रस्ताव पारित कर दिल्ली भेजा था। उसकी मांग थी कि मोदी के नाम का एलान हो। जाहिर तौर पर पार्टी के लिए सबसे अच्छा संदेश तब जाएगा जब खुद भीष्म पितामह आडवाणी की ओर से इसकी घोषणा हो। यह जहां खुद आडवाणी की छवि और बुलंद करेगा वहीं अलग-अलग पाटों पर चलती दिख रही भाजपा को भी मजबूत करेगा। यह अब किसी से छुपा नहीं है कि प्रवाह के बीच अवरोध कौन है, लेकिन यह समझ से परे है कि अवरोध भी अपनी प्रकृति क्यों बदल रहा है? गोवा में चुनाव अभियान समिति की कमान सौंपे जाने के बाद मोदी दिल्ली आए थे तो सार्वजनिक रूप से अपनी नाराजगी जता चुके आडवाणी के आवास पर गए थे। जानकारी के मुताबिक मोदी ने आडवाणी से स्पष्ट शब्दों में पूछा था- क्या मुझसे कोई समस्या है? बताते हैं कि आडवाणी का जवाब ना में था। उसके बाद से दिल्ली में ही कभी आवास पर तो कभी बैठकों में मोदी-आडवाणी की तीन चार मुलाकातें हो चुकी हैं।


संघ प्रमुख मोहन भागवत के हस्तक्षेप के बाद संसदीय बोर्ड से इस्तीफा वापस लेने वाले आडवाणी भागवत से तीन बार मिल चुके हैं। दिल्ली के बाद नागपुर और आखिरी बार दो दिन पहले खुद उनके आवास पर ही भागवत ने आडवाणी और सुषमा स्वराज को बता दिया कि अब अलग-अलग सुर पार्टी के लिए घातक होगा। लिहाजा स्थिति हाथ से बाहर जाए उससे पहले नेतृत्व का निर्णय लेकर आगे बढ़ना चाहिए। भागवत से हुई मुलाकात इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह खरी-खरी बात करने के लिए जाने जाते हैं। आडवाणी समेत दिल्ली में बैठे केंद्रीय नेतृत्व की अनिच्छा के बावजूद तीन साल पहले नितिन गडकरी का दिल्ली में राजतिलक कर वह यह साबित कर चुके हैं। पिछले दिनों में आडवाणी बड़ा दिल नहीं दिखा पाए। मध्य प्रदेश में जाकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की प्रशंसा करना कोई गलत नहीं, लेकिन जिस तरह उन्होंने चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष के मुकाबले शिवराज को खड़ा किया वह पार्टी में भी अधिकांश लोगों के गले नहीं उतरा। उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की थी कि शिवराज ज्यादा काबिल हैं। यह आडवाणी की हताशा ही दिखाती थी। इससे पहले संसदीय बोर्ड में भी वह शिवराज को लाने की कोशिश कर चुके थे। केवल इसलिए ताकि मोदी के सामने हमेशा के प्रतिद्वंद्वी को खड़ा दिखाया जाए, लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद वह ऐसा कुछ भी नहीं करा पाए।

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यह बताने को काफी था कि बदले हालात मे उनके तराजू का पलड़ा हल्का है। कवायद अभी भी जारी है कि प्रधानमंत्री उम्मीदवार के नाम की घोषणा अंत तक टाली जाए। इसी क्रम में शिवराज ने भी तीन दिन पहले दिल्ली आकर संघ में नंबर दो भैयाजी जोशी के साथ-साथ आडवाणी से भी मुलाकात की थी। बताते हैं कि उनकी ओर से वही चिंता जताई गई जो आडवाणी जताते रहे हैं। सुषमा स्वराज मौन हैं, लेकिन वह भी चाह रही हैं कि घोषणा जितना टल सके उतना अच्छा। दूसरी तरफ भितरघात की इन कोशिशों को देखते हुए अरुण जेटली ने हाल में कहा था-अगर नेतृत्व में आकर्षण हो तो चुनाव राष्ट्रपति चुनाव की तर्ज पर होता है। हमें उसका लाभ मिलेगा। कह सकते हैं कि अगर चुनाव सत्ता विरोधी लहर पर हुआ और हम हिट विकेट नहीं हुए तो विश्व की कोई ताकत हमें नहीं हरा सकती है। अरुण जेटली ने शायद पार्टी के अधिकांश नेताओं, कार्यकर्ताओं और समर्थकों के मूड-मिजाज और देश में कांग्रेस के खिलाफ बन रहे माहौल को समझने के बाद ही यह कहा होगा। यह सच है कि मोदी भाजपा की दूसरी पीढ़ी में सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभर चुके हैं। वह गुजरात की सीमा लांघकर भाजपा के लिए हैदराबाद जैसी अन-उपजाऊ जमीन पर भी अपनी लोकप्रियता का प्रदर्शन कर चुके हैं। दिलचस्प तथ्य यह भी है कि जहां भाजपा अपनी खो चुकी ऊर्जा प्राप्त कर सकती है वहां मोदी ने अभी दौरे भी नहीं शुरू किए हैं। वजह साफ है कि मोदी तभी कोई सीमा लांघेंगे जब उनके सामने खड़ी दीवारें तोड़ दी जाएंगी। भाजपा की जड़ें जिन प्रदेशों में मजबूत रही हैं उनमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, झारखंड शामिल हैं। मोदी अभी इन क्षेत्रों में दौरा करने से बच रहे हैं। यह अलग बात है कि 10 सितंबर को जयपुर और 15 सितंबर को वह रेवाड़ी का दौरा करेंगे, लेकिन उनको यमुना पार कराने का फैसला अब तक नहीं लिया गया है। अगर पार्टी अब भी नहीं चेती तो शायद बहुत देर हो जाएगी।


इस आलेख के लेखक प्रशांत मिश्र हैं

(लेखक दैनिक जागरण के राजनीतिक संपादक हैं)



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