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देश से क्या कहेंगे मनमोहन

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कांग्रेस एकनिष्ठ भक्ति की पार्टी है। यहां नेता के प्रति निष्ठा सबसे बड़ा सिद्धांत है। मनमोहन सिंह को यह बात समझ में आ गई होगी। ऐसा नहीं है कि उन्हें यह पता नहीं था। हां, सत्ता के नए केंद्र की स्थापना उनकी छवि और प्रतिष्ठा की कीमत पर होगी शायद इसकी उम्मीद उन्हें नहीं रही होगी। प्रधानमंत्री पद की गरिमा को ठेस पहुंचने से परेशान लोगों की श्रेणी में और जो भी हों डॉ. मनमोहन सिंह नहीं हैं। उन्हीं के मुताबिक उन्होंने बहुत ऊंच-नीच देखी है। अमेरिका से लौटते हुए अपने विशेष विमान में मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि वह देखेंगे कि हवा का रुख किस तरफ है। सही बात है, प्रधानमंत्री की राजनीति का यह मूल मंत्र है। हवा का रुख देखकर न चले होते तो बिना किसी जनाधार के नौ साल तक प्रधानमंत्री कैसे रहते। 1इस पूरे घटनाक्रम से मनमोहन सिंह ने एक बार फिर साबित किया है कि उनके लिए आत्मसम्मान पद से बड़ा नहीं है। जो नहीं जानते वे जान लें कि राजनीति में वह अपना आत्मसम्मान बचाने नहीं, कुछ हासिल करने आए थे। उन्होंने देखा है कि 1991 में आत्मसम्मान बचाकर चंद्रशेखर सत्ता से हमेशा के लिए बाहर हो गए। उनकी यह सोच ही उनके लिए तीसरे कार्यकाल का दरवाजा खुला रखेगी, इसे वह बखूबी जानते हैं। दागी जनप्रतिनिधियों को बचाने वाला अध्यादेश कानून बन जाए या फाड़कर फेंक दिया जाए उनकी बला से। शुक्रवार को राहुल गांधी ने जब प्रधानमंत्री और उनकी कैबिनेट के खिलाफ मोर्चा खोला उसी दिन से सबको पता है कि इस लड़ाई में जीत किसकी होगी। फैसला जीत-हार के तरीके के बारे में होना था। बुधवार को राहुल गांधी प्रधानमंत्री से मिले तो प्रधानमंत्री समझ गए कि हवा का रुख किस ओर है।

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प्रधानमंत्री अकेले हैं। जो अपनी मदद के लिए तैयार न हो उसकी मदद करने कौन आएगा। उसके बाद कांग्रेस कोर ग्रुप की बैठक हुई। उसमें वही तय हुआ जो राहुल गांधी चाहते थे। उस बैठक में प्रधानमंत्री भी मौजूद थे। वह अध्यादेश लाने के लिए हुई कोर ग्रुप की बैठक में भी पार्टी की राय से सहमत थे और इसे वापस लेने के फैसले से भी। आखिर वह पार्टी के अनुशासित सिपाही जो हैं।1कांग्रेस पार्टी और प्रधानमंत्री के मंत्रिमंडल के सहयोगी भले ही न पूछें पर देश उनसे एक सवाल का जवाब जरूर जानना चाहेगा कि इस अध्यादेश पर उनकी कोई राय है कि नहीं। वह देश से क्या कहेंगे कि जिस कानून को पहले विधेयक और दूसरी बार अध्यादेश के रूप में उनके मंत्रिमंडल ने पास किया उसके बारे में देश की जनता क्या सोचती है यह उन्हें पता नहीं था। या उन्हें इस बात का पता नहीं चला कि कांग्रेस में सत्ता का केंद्र खिसक गया है। अब उनके एक नहीं दो बॉस हैं। वैसे उन्होंने बिना किसी विरोध के इस स्थिति को भी स्वीकार कर लिया है। मनमोहन सिंह मान-अपमान से ऊपर उठ चुके हैं। मान की उन्हें कामना नहीं और अपमान को उन्होंने अपना प्रारब्ध मान लिया है।


राहुल गांधी ने दागियों को बचाने वाले अध्यादेश के बारे में जो कुछ कहा वह प्रधानमंत्री पद की गरिमा को ठेस पहुंचाने तक ही सीमित नहीं है। अध्यादेश के बारे में प्रेस क्लब में बोलने से पहले उन्होंने अपनी पार्टी के मीडिया प्रभारी के बारे में जो कहा वह उनकी कार्यशैली और सोच को दर्शाता है। उन्होंने अजय माकन से पूछा कि क्या हो रहा है। अजय माकन ने बता दिया। राहुल गांधी ने तिरस्कार के अंदाज में कहा कि ये मुङो पार्टी की लाइन समझा रहे थे। जैसे पार्टी की लाइन समझाना कोई अपराध हो। इससे यह ध्वनि निकलती है कि पार्टी की लाइन वह होगी जो राहुल गांधी बोलेंगे, वह नहीं जो पार्टी ने तय किया है। कांग्रेस इस समय जिस चक्रव्यूह में फंसी है, उसकी रचना 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद ही हो गई थी। चुनाव के बाद कांग्रेस में नेतृत्व का पीढ़ी परिवर्तन होना था। पार्टी और सरकार राहुल गांधी और उनके नए साथियों की कमान में चलनी थी।

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चुनाव नतीजे आने के बाद से ही राहुल गांधी की भूमिका को लेकर चर्चाएं होने लगी थीं। वह पहले सरकार में जिम्मेदारी संभालेंगे या पार्टी में। सरकार में जाने की बात आई तो कहा गया कि गांधी परिवार का कोई नेता किसी के मातहत काम नहीं करता। सो राहुल गांधी सरकार में जाएंगे तो प्रधानमंत्री के ही पद पर। इसके लिए इंतजार था उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव का। कांग्रेस को उम्मीद थी कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में वह किंग नहीं तो किंग मेकर तो बनेगी ही। राहुल गांधी के नेतृत्व के लिए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे अब तक के सबसे बड़े राजनीतिक सदमे की तरह आए।1अब सवाल है कि क्या कांग्रेस में राहुल गांधी का राज्याभिषेक पुरानी पीढ़ी के नेताओं के आत्मसम्मान की कीमत पर होगा। यह राहुल गांधी को तय करना है। राहुल गांधी की नजर में अगर अध्यादेश बकवास है तो कैबिनेट में बैठे कांग्रेस के वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं के बारे में उनकी क्या राय है। इस समस्या का दूसरा पहलू है सहयोगी दलों का। राहुल गांधी संप्रग के सहयोगी दलों को क्या संदेश देना चाहते हैं। उनके रवैये से अभी जो संदेश गया है वह तो यही है कि उन्हें सहयोगियों की परवाह नहीं है। जिस मुद्दे पर उन्होंने राय बना ली है उसके बारे में उन्हें सहयोगी दलों की राय की कोई चिंता नहीं है। तीन सहयोगी दल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, नेशनल कांफ्रेंस और समाजवादी पार्टी राहुल गांधी के तौर-तरीके से सार्वजनिक तौर पर असंतोष जाहिर कर चुके हैं। फारूख अब्दुल्ला कह रहे हैं कि राहुल गांधी को गलत सलाह दी गई है। डीपी त्रिपाठी कह रहे हैं कि हम कांग्रेस के सहयोगी हैं, अनुयायी नहीं। समाजवादी पार्टी बोल रही है कि वह अध्यादेश का समर्थन कर रही है। राहुल गांधी को सपनों की दुनिया से वास्तविकता की दुनिया में लौट आना चाहिए। यह कांग्रेस के विराट जनाधार का दौर नहीं है। यह गठबंधन की राजनीति का दौर है। राहुल गांधी अभी तक वोट दिलाने वाले नेता के तौर पर अपनी साख कायम नहीं कर पाए हैं। चुनाव में जिताकर लाने की क्षमता ही इस परिवार के तिलस्म को कायम रखे हुए है। गांधी-नेहरू परिवार का यह तिलस्म जिस दिन टूट जाएगा, उस दिन वीटो का अधिकार भी खत्म हो जाएगा।


इस आलेख के लेखक प्रदीप सिंह हैं


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